पीलीभीत: छात्रों की जिंदगी से खिलवाड़, कागज़ों में सुरक्षित जमीन पर खतरनाक सफर
पूरनपुर, पीलीभीत। स्कूल जहां बच्चे भविष्य गढ़ने जाते हैं, वहीं आज उनकी जिंदगी सबसे ज्यादा खतरे में है। पढ़ाई की गुणवत्ता, फीस, इंफ्रास्ट्रक्चर—इन सब पर बहस तो होती है, लेकिन स्कूल परिवहन की खतरनाक और मानकविहीन व्यवस्था पर शायद ही कभी गंभीर चर्चा होती है। हालिया हादसे ने फिर साबित कर दिया कि बच्चों की सुरक्षा हमारी प्राथमिकता कभी रही ही नहीं।
जिले के साथ ही पूरनपुर, कलीनगर, अमरिया, माधोटांडा समेत अधिकांश तहसीलों में शिक्षा व्यवस्था का सबसे कमजोर पहलू स्कूल परिवहन प्रणाली बन चुका है। स्कूल संचालक फीस वसूली में भले आगे हों, लेकिन छात्रों की सुरक्षा पर जिम्मेदारी निभाने में पूरी तरह नाकाम साबित हो रहे हैं।
हालिया दुर्घटना ने एक बार फिर साबित कर दिया कि जिले में मानकविहीन स्कूल वाहन किसी बड़े हादसे को न्यौता देने से कम नहीं। माधोटांडा–पीलीभीत मार्ग पर हुई दुर्घटना कोई आकस्मिक घटना नहीं, बल्कि लंबे समय से पनप रही खतरनाक लापरवाही का अपरिहार्य परिणाम है। जिस टाटा मैजिक में छात्र भरे गए, वह वाहन कभी किसी स्कूल में बच्चों को ले जाने के योग्य था ही नहीं। लेकिन जिले के अधिकांश निजी स्कूल ऐसे ही कई मैजिक, ऑटो, वैन और जर्जर वाहनों से बच्चों की “ढुलाई” कर रहे हैं। ढुलाई शब्द इसलिए, क्योंकि इस प्रक्रिया में न तो सुरक्षा का ध्यान, न सुविधा का, और न ही किसी मानक का पालन किया जाता है।
सबसे बड़ी समस्या यह है कि जिम्मेदार विभाग अपनी जिम्मेदारी से बच रहे हैं। शिक्षा विभाग कहता है—यह परिवहन विभाग का काम। परिवहन विभाग कहता है—यह स्कूल प्रबंधन देखे। पुलिस कहती है—स्टाफ कम है। और इस गोलचक्कर में सबसे ज्यादा जोखिम उठाना पड़ता है उन मासूम बच्चों को, जिन्हें स्कूल समय पर पहुंचाने की दौड़ में हर सुबह खतरे के हवाले कर दिया जाता है।
बड़ी विडंबना है कि कागज़ों में सब कुछ व्यवस्थित दिखता है—बसें दर्ज हैं, फिटनेस रिपोर्ट है, परिवहन समिति की मीटिंग हुई बताई जाती है। लेकिन जमीन पर तस्वीर पूरी तरह उलट है। बच्चे अधिक क्षमता से ठूंसे जाते हैं। वाहन पुराने और जर्जर होते हैं। चालक प्रशिक्षित नहीं। फायर सेफ्टी से लेकर फर्स्ट-एड तक कुछ नहीं। यह स्थिति केवल अव्यवस्था नहीं, बल्कि संपूर्ण सिस्टम की नाकामी और अपराध है।
अभिभावकों की मजबूरी भी कम नहीं। निजी स्कूलों में परिवहन सेवा अक्सर अनिवार्य कर दी जाती है—चाहे वाहन मानकों पर खरे उतरें या नहीं। अभिभावक जानते हैं कि गाड़ियां खतरनाक हैं, लेकिन विकल्प न होने के कारण मजबूर हो जाते हैं।सवाल यह भी है कि हादसे के बाद कार्रवाई क्यों नहीं होती? क्या किसी बड़े हादसे में किसी बच्चे की जान जाना ही विभागों को जगाएगा? इस दुर्घटना के बाद भी न तो स्कूलों की आकस्मिक जांच हुई, न एक भी वाहन सीज़ हुआ, न ही किसी संचालक पर गंभीर धाराओं में मुकदमा।किसी भी सभ्य समाज का पहला कर्तव्य अपने बच्चों की सुरक्षा होता है।
लेकिन यहां स्थिति उलट है, हम बच्चों को जोखिम में डालकर विकास, शिक्षा और “स्मार्ट स्कूलों” की बात करते हैं।अब वक्त आ गया है कि जिला प्रशासन, परिवहन विभाग, पुलिस और शिक्षा विभाग की संयुक्त टीम महज औपचारिक नहीं, सख्त और ईमानदार अभियान चलाए।हर वाहन की फिटनेस। चालक की जांच ओवरलोडिंग पर तुरन्त वाहन सीज़ और स्कूल प्रबंधन पर कानूनी कार्रवाई यह सब तभी संभव होगा। जब राजनीतिक और प्रशासनिक इच्छा शक्ति दिखाई जाए।स्कूल बसों में सफर बच्चों के लिए सुरक्षित होना उनका अधिकार है, कोई कृपा नहीं। अगर व्यवस्थाएं ऐसे ही रही तो हादसे बढ़ते रहेंगे, मासूम घायल होते रहेंगे, और हम हर बार यही लिखते रहेंगे—“दुर्घटना ने व्यवस्था की पोल खोल दी।”
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