अम्बेडकर नगर : गरीब मछुआ समुदाय के साथ धोखा चहेते को दिया गया लाभ

May 3, 2026 - 22:01
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अम्बेडकर नगर : गरीब मछुआ समुदाय के साथ धोखा चहेते को दिया गया लाभ
सांकेतिक फोटो (AI जनरेटेड)
  • जनपद में ‘कागज़ी मछलियों’ का खेल! करोड़ों की आहार मिलें फाइलों में तैर रहीं, जमीन पर सूखा तालाब”
  • एक ही परिवार के चार लोगों को दिया गया लाभ

अम्बेडकरनगर, अचल वार्ता। जनपद के मत्स्य विभाग में इन दिनों एक ऐसा मामला सामने आया है, जिसे सुनकर लोग यही कह रहे हैं “यहां मछलियां कम, कागज ज़्यादा तैर हो रहे हैं!” मामला है प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना के तहत वृहद और लघु मत्स्य आहार मिलों की स्थापना का, जिसमें वित्तीय वर्ष 2023-24 में चयन हुआ और 2024-25 में अनुदान भी पूरे सम्मान के साथ लाभार्थियों के खाते में भी पहुंच गया। लेकिन धरातल पर नजर नहीं आते—आते भी हैं तो अधूरे हैं—लेकिन रुपया पूरा निकाल लिया। असली कहानी जरा अलग है।

धरातल पर जब नजर डाली गई, तो “मिल” नाम की चीज़ दूर-दूर तक दिखाई नहीं दी। न मशीनें, न उत्पादन, न बिक्री—बस सब कुछ फाइलों में बड़े आराम से चल रहा है। ऐसा लग रहा है जैसे कागज़ों में ही मछलियां मोटी हो रही हैं और हकीकत में तालाब सूखा पड़ा है। विश्वास सूत्र बता रहे हैं कि

भ्रष्टाचार की जड़ बहुत ऊपर तक फैली हुई बताया जा रहा है। मत्स्य पालन मंत्री से लेकर अम्बेडकरनगर के जिम्मेदार अधिकारी, ADF, डिप्टी डायरेक्टर अयोध्या, अम्बेडकरनगर के बड़े बाबू  अम्बेडकरनगर के मत्स्य पालन विभाग के सभी अधिकारी नाम इस पूरे मामले में चर्चा में हैं। इस पूरे प्रकरण ने बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है कि आखिर इतनी बड़ी “कागज़ी खेती” बिना मिलीभगत के कैसे हो सकती है?

शिकायतकर्ता का आरोप है कि शासनादेश के मानकों को ऐसे दरकिनार किया गया है जैसे जाल से छोटी मछलियां निकाल दी जाती हैं। मछली क्रय-विक्रय केंद्र एवं आहार मिल खोलने के नाम पर करोड़ों रुपये जिम्मेदार अधिकारियों से मिलकर “डकार” लिए। बात यहीं खत्म नहीं होती।

  विश्वसनीय सूत्रों के अनुसार, एक ही परिवार के चार लोगों को लाभ दे दिया गया। अब लोग कयास लगा रहे हैं “कहीं ये बड़े लोगों के खास तो नहीं?” क्योंकि कई ऐसे लाभार्थियों को फायदा पहुंचा दिया गया, जिनकी परियोजनाएं जमीन पर दिखाई ही नहीं देतीं।

  ग्रामीणों की मानें तो यह पूरा मामला “मत्स्य पालन” कम और “मत्स्य-भक्षण” ज्यादा लगता है जहां नाम मात्र का काम दिखाकर पूरी अनुदान राशि निकाल ली गई और विभागीय “सांठगांठ” की नाव पर बैठकर सरकारी धन को आराम से निगल लिया गया। अब हालत यह है कि कागज़ों में मिलें धड़ल्ले से उत्पादन कर रही हैं, लेकिन जमीन पर सन्नाटा पसरा है। जिम्मेदार अधिकारियों को इसकी भनक है या नहीं, यह भी अपने आप में एक बड़ा सवाल है।

 फिलहाल जनपद में चर्चा जोरों पर है क्या इस “कागजी मछली घोटाले” पर जांच बैठेगी? क्या दोषियों पर कार्रवाई होगी? या फिर यह मामला भी फाइलों में ही तैरता रहेगा?

अब देखना यह है कि इस कथित ‘मत्स्य कथा’ का सच बाहर आता है या फिर कागजी मछलियां यूं ही तैरती रहेंगी…

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