तमिलनाडु में मानव-वन्यजीव संघर्ष बढ़ा, 10 वर्षों में 685 मौतें; स्थानीय सहभागिता जरूरी

तमिलनाडु में मानव-वन्यजीव संघर्ष गंभीर संकट बन गया। पिछले 10 साल में 685 लोगों की मौत। वन विभाग ने जनभागीदारी और AI निगरानी पर जोर दिया।

Jan 30, 2026 - 20:06
Feb 14, 2026 - 13:02
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तमिलनाडु में मानव-वन्यजीव संघर्ष बढ़ा, 10 वर्षों में 685 मौतें; स्थानीय सहभागिता जरूरी

कोयंबटूर, अचल वार्ता।

तमिलनाडु में मानव-वन्यजीव संघर्ष एक गंभीर मानवीय और पर्यावरणीय संकट बनता जा रहा है। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, पिछले दस वर्षों में राज्य में इस संघर्ष के कारण 685 लोगों की मौत हुई है, जिनमें अकेले पिछले एक साल में हुई 43 मौतें शामिल हैं।

वन विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों ने चेतावनी दी है कि इस संकट का समाधान केवल तकनीक या सख्ती से नहीं, बल्कि स्थानीय समुदायों की सक्रिय भागीदारी से ही संभव है।

पश्चिमी घाट और स्थानीय संघर्ष

बुधवार को कोयंबटूर में आयोजित उच्च-स्तरीय सेमिनार में अनामलाई टाइगर रिजर्व (ATR) के मुख्य वन संरक्षक और क्षेत्र निदेशक डी. वेंकटेश ने इस संकट के तकनीकी और पारिस्थितिक पहलुओं पर प्रकाश डाला।

उन्होंने कहा कि तेनकासी, विरुधुनगर, कोयंबटूर, तिरुपुर, थेनी, सेलम, धर्मपुरी और कृष्णागिरी जैसे जिलों में संघर्ष की घटनाएं सबसे अधिक दर्ज की जा रही हैं।

पर्यावरणीय गिरावट और वन्यजीवों का आवागमन

वेंकटेश ने बताया कि राज्य के कई हरे-भरे दिखने वाले वन क्षेत्र असल में हरे रेगिस्तान में बदल चुके हैं, जिसका कारण विदेशी पौधों की प्रजातियों का तेजी से फैलना है।

यह वन्यजीवों के परंपरागत आवास और भोजन को प्रभावित करता है।

हाथी पहले कोडाइकनाल के बेरिजम इलाके तक सीमित थे, लेकिन अब डिंडीगुल की सीमाओं तक भी देखे जा रहे हैं।

विशेषज्ञों के अनुसार, जंगल की जमीन पर अतिक्रमण, पक्की सड़क निर्माण और नकदी फसलों की खेती इस समस्या के मुख्य कारण हैं।

तकनीकी उपाय और स्थानीय सहयोग की जरूरत

वन विभाग AI आधारित मॉनिटरिंग सिस्टम और हाथियों की रीयल-टाइम निगरानी जैसे तकनीकी उपाय अपना रहा है, ताकि संवेदनशील गांवों को समय रहते चेतावनी दी जा सके।

लेकिन प्रधान मुख्य वन संरक्षक श्रीनिवास आर. रेड्डी ने कहा कि ये उपाय केवल तभी सफल होंगे जब स्थानीय लोग वन विभाग की सलाह का पालन करें और वनों के मूल स्वरूप को बचाने में सहयोग दें।

इंसान और वन्यजीव का सह-अस्तित्व

वन्यजीवों और मानव समुदाय के बीच सह-अस्तित्व की रणनीति को अपनाना ही इस संकट का स्थायी समाधान है। विशेषज्ञों का मानना है कि सुरक्षित जंगल, जागरूक समुदाय और तकनीकी निगरानी के बिना यह समस्या और गंभीर हो सकती है।

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