रूस-यूक्रेन युद्ध: भारत की ऊर्जा नीति बनी गेमचेंजर, यूरोप में भी दिखा असर

रूस-यूक्रेन युद्ध के बीच भारत की ऊर्जा नीति दुनिया में चर्चा का विषय बन गई है। भारत के फैसले ने कई देशों को नई राह दिखाई, वहीं हंगरी ने भी रूस से तेल खरीद पर बड़ा रुख अपनाया है।

Feb 25, 2026 - 21:05
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रूस-यूक्रेन युद्ध: भारत की ऊर्जा नीति बनी गेमचेंजर, यूरोप में भी दिखा असर

अचल वार्ता

India की विदेश नीति अब वैश्विक कूटनीति में चर्चा का बड़ा विषय बन गई है। Russia-Ukraine युद्ध शुरू होने के बाद पश्चिमी देशों ने रूस को आर्थिक और कूटनीतिक रूप से अलग-थलग करने की कोशिश की थी। United States और कई European Union देशों ने रूस पर कड़े प्रतिबंध लगाए, लेकिन समय के साथ वैश्विक स्थिति बदलती नजर आ रही है।

भारत ने युद्ध के बाद पश्चिमी दबाव के बावजूद रूस से सस्ता कच्चा तेल खरीदना जारी रखा। भारत सरकार का कहना था कि देश की 140 करोड़ आबादी की ऊर्जा जरूरतों और महंगाई नियंत्रण के लिए सस्ती ऊर्जा आवश्यक है। इसी नीति ने भारत को वैश्विक ऊर्जा बाजार में एक मजबूत खिलाड़ी के रूप में स्थापित किया है।

विशेषज्ञों का मानना है कि भारत की इस रणनीति ने कई देशों को नई राह दिखाई है। ऊर्जा सुरक्षा को प्राथमिकता देते हुए अब कई देश अपनी आर्थिक जरूरतों के अनुसार फैसले लेने लगे हैं।

हंगरी भी भारत के रास्ते पर

यूरोप में भी रूस से ऊर्जा खरीदने को लेकर मतभेद बढ़ते दिख रहे हैं। Hungary ने साफ कहा है कि वह रूस से तेल और गैस खरीदने के मामले में किसी बाहरी दबाव को स्वीकार नहीं करेगा। हंगरी के विदेश मंत्री Péter Szijjártó ने कहा कि देश महंगे और कम भरोसेमंद ऊर्जा स्रोतों को अपनाने के लिए तैयार नहीं है।

हंगरी का तर्क है कि जब रूस से सस्ता और स्थिर ऊर्जा आपूर्ति मिल रही है, तो केवल राजनीतिक कारणों से अधिक महंगा तेल खरीदना उचित नहीं होगा। विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला देश की अर्थव्यवस्था और उद्योगों को स्थिर रखने की रणनीति का हिस्सा है।

यूरोप में बढ़ी चिंता

हंगरी के रुख से Germany समेत कई यूरोपीय देश असहज बताए जा रहे हैं। जर्मनी ने हंगरी से अपने निर्णय पर पुनर्विचार करने की अपील की है, लेकिन कूटनीतिक जानकारों का मानना है कि मौजूदा परिस्थितियों में इस पर बड़ा बदलाव मुश्किल है।

यूरोपीय संघ के कई सदस्य देश अब यह समझने लगे हैं कि बिना रूसी ऊर्जा के आर्थिक संतुलन बनाए रखना चुनौतीपूर्ण हो सकता है। इसी कारण रूस पर नए प्रतिबंधों को लेकर भी फिलहाल सहमति बनती नजर नहीं आ रही है।

भारत की नीति को वैश्विक समर्थन?

भारत की “नेशन फर्स्ट” नीति को कई देशों के लिए उदाहरण माना जा रहा है। ऊर्जा विशेषज्ञों का कहना है कि हर देश को अपनी ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करने का अधिकार है और इसके लिए आर्थिक हितों को प्राथमिकता देना गलत नहीं है।

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