लापता लोग, लाचार परिवार… और खामोश प्रशासन
“गुमशुदगी बढ़ी, कार्रवाई घटती: कागजों में दौड़ रही पुलिस”
मैगलगंज से फरधान तक—लोग गायब, सिस्टम बेखबर
लापता लोग, सुस्त सिस्टम: पुलिस की पुरानी कहानी ‘तलाश जारी है’
लखीमपुर खीरी, अचल वार्ता। गुमशुदगी की घटनाएं अब खबर नहीं, जैसे रोजमर्रा की आदत बनती जा रही हैं। थाना मैगलगंज क्षेत्र के कालीचरन का अभी तक कोई सुराग नहीं लगा, और उधर थाना फरधान क्षेत्र के कैमासुर गांव से एक और व्यक्ति लापता हो गया। सवाल यह नहीं कि लोग क्यों गायब हो रहे हैं, सवाल यह है कि क्या उन्हें खोजने की जिम्मेदारी भी कहीं गायब हो चुकी है? कैमासुर निवासी रमेशचंद्र के अनुसार उनके दामाद संदीप पुत्र कल्लू उर्फ हरिकरन, निवासी ग्राम अंगनपुर (जिला हरदोई), लगभग एक सप्ताह पहले नाराज होकर बिना बताए घर से निकल गए। परिवार ने थाना फरधान में सूचना दे दी, लेकिन “तलाश जारी है” के अलावा अब तक कुछ भी ठोस सामने नहीं आया। हैरानी की बात यह है कि हर गुमशुदगी के बाद पुलिस की प्रतिक्रिया एक जैसी होती है— “मामला दर्ज कर लिया गया है, तलाश जारी है।” यह वही घिसा-पिटा वाक्य है जो हर बार सुनाई देता है, लेकिन नतीजे अक्सर शून्य ही रहते हैं। ऐसा लगता है मानो तलाश कागजों में ज्यादा होती है, जमीनी हकीकत में कम। स्थानीय लोगों में डर और नाराजगी दोनों बढ़ रही है। एक तरफ परिजन अपने लापता सदस्यों की राह देख रहे हैं, दूसरी ओर सिस्टम अपनी औपचारिकता निभाकर चैन की नींद सोता नजर आता है। अब सवाल सीधा है—क्या पुलिस की जिम्मेदारी सिर्फ रिपोर्ट दर्ज करने तक सीमित रह गई है? या फिर गुमशुदा लोगों को ढूंढना भी कभी प्राथमिकता बनेगा? जब तक इन सवालों का जवाब नहीं मिलता, तब तक “तलाश जारी है” सिर्फ एक बयान नहीं, बल्कि व्यवस्था की विफलता का मजाक बनकर रह जाएगा।
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