अंबेडकर नगर : जब स्वास्थ्य विभाग बना ‘जादू विभाग’ और मरीज बने दर्शक
अंबेडकर नगर के बसखारी सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में डॉक्टरों की कमी और अव्यवस्थाओं को लेकर स्थानीय लोगों ने सवाल उठाए हैं। निजी अस्पतालों पर बढ़ती निर्भरता चिंता का विषय बनी।
अंबेडकर नगर का बसखारी सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (सीएचसी) इन दिनों इलाज से ज़्यादा अद्भुत चमत्कारों , करतबों और करामातों के लिए मशहूर हो गया है। स्वास्थ्य सेवाएं अब पटरी पर नहीं, बल्कि *पटरी से उतर चुकी रेलगाड़ी की तरह दिखाई दे रही हैं। कहा जा रहा है कि जैसे ही मुख्य चिकित्सा अधिकारी (सीएमओ) डॉ. संजय कुमार शैवाल ने कार्यभार संभाला, वैसे ही स्वास्थ्य व्यवस्था ने “बीमार पड़ने” का फैसला कर लिया। अब हाल यह है कि मरीज कम और आरोपों की फाइलें ज़्यादा नजर आ रहा हैं।
वसूली एक्सप्रेस: टू-व्हीलर से फोर-व्हीलर तक सब शामिल
सूत्र बताते हैं कि जिले में इन दिनों एक नई सेवा शुरू हो गई है—नाम है “ अवैध वसूली सेवा ”। यह सेवा टू-व्हीलर से लेकर फोर-व्हीलर तक, और पैथोलॉजी से लेकर झोलाछाप डॉक्टरों तक, सबके लिए उपलब्ध है।कथित तौर पर प्राइवेट डायग्नोस्टिक सेंटरों और पैथोलॉजी संचालकों से रजिस्ट्रेशन और जांच के नाम पर ऐसा दबाव बनाया गया कि लोग इलाज छोड़कर हिसाब-किताब में उलझ गए।
बसखारी सीएचसी: डॉक्टरों की कमी और हज़ारों जिम्मेदारियां
बसखारी सीएचसी की हालत ऐसी है कि इसे देखकर लगता है मानो यह केंद्र नहीं, “वन मैन शो” बन चुका हो। बताया जाता है कि कई डॉक्टरों का तबादला कर दिया गया, लेकिन कमाई वाले पद अब भी पूरी तरह स्वस्थ हैं।पूरा स्वास्थ्य केंद्र अब कथित तौर पर केवल एक गायनोलॉजिस्ट डॉ. रजनी सचान के भरोसे है, जिनकी उपस्थिति इतनी रहस्यमयी है कि मरीज उन्हें डॉक्टर कम और लोककथा ज़्यादा मानने लगे हैं।
अधीक्षक जी, एक नहीं, दो-दो कुर्सियों के खिलाड़ी
इधर बसखारी सीएचसी के अधीक्षक महोदय पर आरोप है कि वे टांडा सीएचसी में अल्ट्रासाउंड ड्यूटी के साथ-साथ बसखारी के अधीक्षक पद की भी शोभा बढ़ा रहे हैं।
स्थानीय लोग कह रहे हैं “अधीक्षक साहब के दोनों हाथों में तरबूज हैं!”
अब सवाल यह है कि जब साहब दो जगह काम कर रहे हैं, तो वेतन एक का या दो का? उधर टांडा में अल्ट्रासाउंड सेवा ठप है और जनता अल्ट्रासाउंड मशीन को इतिहास की वस्तु मान चुकी है।
इलाज सरकारी, भरोसा निजी पर
बसखारी की जनता अब सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं से निराश होकर निजी अस्पतालों की शरण में जा चुकी है। इलाज के साथ-साथ जेब का ऑपरेशन भी वहीं हो रहा है।
सब जानते हैं, पर बोल कौन रहा है?
स्थानीय लोगों का आरोप है कि मुख्य चिकित्सा अधिकारी ने जिम्मेदारी की जगह मौन व्रत धारण कर लिया है और पूरा सिस्टम भ्रष्टाचार का अखाड़ा बनता जा रहा है। अब निगाहें जिला प्रशासन और जिलाधिकारी पर टिकी हैं। क्या वे इस कथित अव्यवस्था पर कार्रवाई करेंगे या फिर सब जानकर भी “अनजान” बने रहेंगे? फिलहाल, बसखारी की स्वास्थ्य व्यवस्था जिले में चर्चा का विषय बनी हुई है।
अब देखना यह है कि प्रशासन इलाज करता है या फिर यह स्वास्थ्य तंत्र आईसीयू से सीधे इतिहास में चला जाता है।
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