साधु का चोला, 22 बीघा जमीन का मायाजाल!
केवटला मठ की जमीन पर ‘तारीख पर तारीख’ के बाद अब FIR का डंडा—419, 420, 467, 468 और 471 में मुकदमा दर्ज
अम्बेडकरनगर। कहते हैं कि साधु-संत मोह-माया त्यागकर संसार से विरक्त हो जाते हैं, लेकिन हंसवर क्षेत्र के केवटला आश्रम-मठ से जुड़ा मामला सामने आने के बाद सवाल उठ रहा है कि कहीं यहां मोह-माया त्यागने के बजाय जमीन पर ही मोह तो नहीं हो गया! मामला केवटला आश्रम मठ की करीब 22 बीघा जमीन से जुड़ा बताया जा रहा है। आरोप है कि हरिशंकर दास ने साधु का भेष धारण कर स्वर्गीय बाबा रामनिहाल दास से संबंधित कथित फर्जी दस्तावेज तैयार कराए और राजस्व अभिलेखों में हेरफेर कर मठ की जमीन अपने नाम दर्ज करा ली। आरोपों के मुताबिक, इसके बाद मठ की जमीन का एक हिस्सा अलग-अलग लोगों को बेचे जाने का सिलसिला भी चला। शिकायत में वर्ष 2003, 2007 और 2010 में अलग-अलग व्यक्तियों के नाम जमीन के बैनामे किए जाने का उल्लेख किया गया है। यानी मठ की जमीन पर ऐसा ‘लेन-देन अध्याय’ चला कि जमीन गई और सवाल पीछे छूट गए।
पेड़ भी नहीं बचे—शीशम, सागौन और साखू पर भी आरोप
मामला केवल जमीन तक सीमित नहीं रहने का आरोप है। शिकायत में मठ परिसर के बेशकीमती शीशम, सागौन और साखू के पेड़ों को काटकर बेचने तथा रकम अपने पास रखने का भी आरोप लगाया गया है। अब सवाल यह है कि अगर आरोप सही पाए जाते हैं तो मठ की जमीन के साथ पेड़ों का हिसाब-किताब किस खाते में गया?
साधु एक, पहचान अनेक’—दस्तावेजों ने बढ़ाई कहानी की पेचीदगी
शिकायतकर्ता मनीषदास की ओर से लगाए गए आरोपों में यह भी कहा गया है कि हरिशंकर दास की पहचान से जुड़े दस्तावेज अलग-अलग स्थानों पर सामने आते हैं। आरोप है कि आजमगढ़ के परिवार रजिस्टर और बहराइच के सरकारी अभिलेखों में भी उनकी मौजूदगी से संबंधित रिकॉर्ड बताए जा रहे हैं। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है—एक व्यक्ति, अलग-अलग दस्तावेज और अलग-अलग पहचान की कहानी आखिर कितनी लंबी है?
अदालत के आदेश के बाद पुलिस ने कसा शिकंजा
मामले में सिविल जज (सीनियर डिवीजन)-त्वरित/एसीजेएम अम्बेडकरनगर यादवेन्द्र सिंह-द्वितीय की अदालत के आदेश के बाद हंसवर पुलिस ने प्राथमिकी दर्ज की है। पुलिस ने मामले में भारतीय दंड संहिता की धाराओं 419, 420, 467, 468 और 471 के तहत मुकदमा दर्ज किया है। मुकदमा दर्ज होने के बाद अब जांच की दिशा जमीन के कथित फर्जी दस्तावेज, नामांतरण, बैनामा और अन्य संबंधित अभिलेखों की ओर बढ़ने की उम्मीद है।
अब असली परीक्षा विवेचना की—कागज बोलेंगे या कहानी?
फिलहाल मुकदमा दर्ज होने के बाद मामला जांच के पाले में है। आरोपों की पुष्टि होना अभी विवेचना और साक्ष्यों पर निर्भर करेगा। पुलिस यह भी जांच करेगी कि कथित दस्तावेज कैसे तैयार हुए, राजस्व अभिलेखों में नाम कैसे दर्ज हुआ, जमीन किन परिस्थितियों में बेची गई और इस पूरे प्रकरण में अन्य लोगों की भूमिका क्या रही। अब देखने वाली बात यह होगी कि 22 बीघा जमीन की यह ‘मायाजाल कथा’ विवेचना में कहां तक पहुंचती है—कौन-कौन से चेहरे सामने आते हैं और कानून का शिकंजा किस-किस तक पहुंचता है। फिलहाल इतना जरूर है कि मठ की जमीन का मामला अब सिर्फ जमीन का मामला नहीं रहा, बल्कि दस्तावेजों, बैनामों और कथित जालसाजी की पूरी फाइल बन चुका है।
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