लक्ष्मी डायग्नोस्टिक पर कार्रवाई क्यों नहीं? बसखारी अधीक्षक अजय कुमार लाचार या लक्ष्मी जी का चमत्कार!
अम्बेडकरनगर अचल वार्ता।स्वास्थ्य विभाग एक बार फिर अपने पुराने और पसंदीदा खेल 'विशेष जांच अभियान' की गेंद फेंकने जा रहा है। 16 से 30 नवंबर तक तहसीलों में गली-कस्बों के 'मुन्ना भाई' क्लीनिकों से लेकर बिना रजिस्ट्रेशन वाले अस्पतालों की नाप-जोख होगी। सीएमओ साहब का कड़क आदेश है कि नियम तोड़ने वालों पर सीधे मुकदमे दर्ज होंगे। हाल ही में बसखारी में गर्भपात और इल्तिफातगंज में दंत क्लीनिक में ओवरडोज़ एनेस्थीसिया से महिलाओं की मौतों के बाद जागा महकमा अब 'एक्शन मूड' में दिख रहा है। लेकिन जिले की जनता इस अभियान का नाम सुनते ही मुस्कुरा रही है, क्योंकि स्वास्थ्य विभाग की जांच व्यवस्था पर पहले से ही सवालों की लंबी फेहरिस्त मौजूद है। जनता का सवाल है कि टीम में ईमानदार जांचकर्ता ज्यादा हैं या कथित 'वसूली के धुरंधर'? कहीं ऐसा न हो कि झोलाछापों की जांच के नाम पर विभाग के भीतर ही 'मासिक वसूली का रिन्यूअल अभियान' शुरू हो जाए!
लक्ष्मी डायग्नोस्टिक सेंटर: एक साल, 10 शिकायतें और जांच रिपोर्टों का अनोखा चक्र!
बसखारी स्थित लक्ष्मी डायग्नोस्टिक सेंटर का मामला स्वास्थ्य विभाग की जांच व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है। शिकायतकर्ता के मुताबिक, करीब एक वर्ष से लक्ष्मी डायग्नोस्टिक सेंटर केंद्र के संबंध में पांच से 10 बार शिकायतें की जा चुकी हैं। लेकिन हर शिकायत के बाद कार्रवाई की जगह रिपोर्टों का ऐसा सिलसिला सामने आया, जिसे देखकर लगता है कि विभाग में जांच कम बसखारी सी एच सी अध्यक्ष अजय वसूली कर रहे है। पहली जांच रिपोर्ट में सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र बसखारी के अधीक्षक डॉ. अजय कुमार ने लिखा कि लक्ष्मी डायग्नोस्टिक सेंटर के संचालक ने जांच में सहयोग नहीं किया। इस संबंध में मुख्य चिकित्सा अधिकारी और पुलिस प्रशासन के साथ टांडा एसडीएम को पत्र लिखने की बात भी लिखा। अब सवाल यह है कि जब संचालक जांच में सहयोग नहीं कर रहा था तो उसके बाद विभाग ने कौन-सी प्रभावी कार्रवाई की? क्या केंद्र को तत्काल सील किया गया? क्या मुकदमा दर्ज हुआ? या फिर मामला सरकारी फाइलों में ऐसी जगह पहुंच गया, जहां से बाहर निकलने जिले के पी सी पी एन डीटी आशुतोष सिंह लेकर सी एचसी अधीक्षक वसूली का खेल ऊपर तक तो नहीं
लक्ष्मी डायग्नोस्टिक सेंटर की शिकायत पर जांच में क्यों सील किए गए प्रकाश डायग्नोस्टिक सेंटर व प्रांजल पैथोलॉजिस को को शामिल किया जा रहे हैं।
दूसरी शिकायत की जांच में सामने आए विभागीय पत्र के अनुसार, शिकायतकर्ता के समक्ष कथित लक्ष्मी डायग्नोस्टिक केंद्र की जांच कराने का निर्णय लिया गया था। इसके लिए डॉ. उदयचन्द यादव, उप मुख्य चिकित्सा अधिकारी को जांच के निर्देश दिए गए। शिकायतकर्ता से भी मौके पर उपस्थित रहने का अनुरोध किया गया, लेकिन समयाभाव के कारण जांच नहीं हो सकी। इसके बाद आईजीआरएस पोर्टल पर शिकायत समयबद्ध होने का हवाला देते हुए अधीक्षक सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र बसखारी को उप जिलाधिकारी से समन्वय बनाकर जांच कराने का निर्देश दिया गया। फिर दिनांक 29 जून 2026 को शाम 4:45 बजे नायब तहसीलदार टांडा के नेतृत्व में अधीक्षक, स्वास्थ्य शिक्षा अधिकारी सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र बसखारी और पुलिस प्रशासन की संयुक्त टीम ने बसखारी ब्लॉक के अंतर्गत प्रकाश डायग्नोस्टिक सेंटर, प्रांजल डायग्नोस्टिक सेंटर और लक्ष्मी डायग्नोस्टिक सेंटर का स्थलीय निरीक्षण किया। यहां सबसे बड़ा सवाल यही है कि शिकायत लक्ष्मी डायग्नोस्टिक सेंटर के खिलाफ थी तो जांच के दायरे में प्रकाश और प्रांजल डायग्नोस्टिक सेंटर को भी किस आधार पर शामिल किया गया? क्या तीनों केंद्रों के विरुद्ध अलग-अलग शिकायतें थीं या एक शिकायत के बहाने पूरे इलाके का निरीक्षण कर लिया गया?शिकायतकर्ता का आरोप है कि बाद में प्रकाश डायग्नोस्टिक सेंटर को सील कर दिया गया, जबकि लक्ष्मी और अन्य केंद्रों के मामले में कार्रवाई को लेकर लगातार सवाल उठते रहे। शिकायतकर्ता ने यह भी आरोप लगाया है कि लक्ष्मी डायग्नोस्टिक सेंटर और जहांगीरगंज स्थित साक्षी डायग्नोस्टिक सेंटर को कथित रूप से संरक्षण दिया जा रहा है। मासिक वसूली या आर्थिक लेनदेन के आरोपों इस आधार पर शिकायतकर्ता लग रहा है कि बार-बार शिकायत देने के बाद कार्रवाई न करना यह स्पष्ट संदेश दे रहा है की वसूली का धंधा तो।
डॉ. ओपी त्रिपाठी की डिग्री का रहस्य: एक डॉक्टर या कई सेंटरों पर एक साथ मौजूद रहने का हुनर!
इस पूरे प्रकरण में डॉ. ओपी त्रिपाठी की डिग्री और विभिन्न केंद्रों पर उनकी संबद्धता भी जांच का अहम विषय बन गई है।शिकायतकर्ता का आरोप है कि डॉ. ओपी त्रिपाठी की डिग्री लक्ष्मी डायग्नोस्टिक सेंटर पर लगी थी, जो अब लक्ष्मी क्लीनिक के रूप में संचालित बताया जा रहा है। इसके अलावा वरदान डायग्नोस्टिक सेंटर पर भी उनकी डिग्री लगी होने और सुबह 10 बजे से शाम 5 बजे तक वहां बैठने का दावा किया गया है।
नगमा क्लीनिक और जहांगीरगंज स्थित साक्षी डायग्नोस्टिक सेंटर में भी उनकी डिग्री के इस्तेमाल का आरोप लगाया गया है। अब सवाल यह है कि क्या एक ही चिकित्सक कई संस्थानों में निर्धारित नियमों के अनुसार अपनी सेवाएं दे रहा है? क्या सभी केंद्रों के लिए उनकी वैध संबद्धता और आवश्यक अनुमति मौजूद है? क्या स्वास्थ्य विभाग ने इन सभी स्थानों पर वास्तविक उपस्थिति और दस्तावेजों का सत्यापन किया? _या फिर डिग्री की ऐसी जादुई व्यवस्था है कि डॉक्टर साहब एक जगह बैठें और उनकी डिग्री कई जगहों पर कौन सा अधिकारी अनुमति दे रहा है!_इस मामले में विभाग को संबंधित चिकित्सक की योग्यता, पंजीकरण, संबद्धता और वास्तविक कार्यस्थल की निष्पक्ष जांच कर सार्वजनिक स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए।
चौथी जांच रिपोर्ट ने फिर खड़े किए सवाल, शिकायतकर्ता ने अधीक्षक पर लगाया संरक्षण का आरोप!
शिकायतकर्ता का कहना है कि लक्ष्मी डायग्नोस्टिक सेंटर के मामले में चौथी बार आई जांच रिपोर्ट से भी कई विरोधाभास सामने आए हैं। शिकायतकर्ता का आरोप है कि केंद्र के खिलाफ बार-बार शिकायत होने के बावजूद कार्रवाई के बजाय अलग-अलग तकनीकी और प्रशासनिक कारणों का सहारा लिया जा रहा है।शिकायतकर्ता ने सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र बसखारी के अधीक्षक डॉ. अजय कुमार पर संबंधित केंद्रों को संरक्षण देने और कथित वसूली का गंभीर आरोप लगाया है।यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि किसी अधिकारी को घूसखोर या भ्रष्ट घोषित करना जांच और प्रमाण के बिना उचित नहीं है। लेकिन बार-बार शिकायत, अलग-अलग रिपोर्ट और कार्रवाई की अस्पष्ट स्थिति निश्चित रूप से निष्पक्ष जांच की मांग करती है।आखिर एक ही प्रकरण में इतनी रिपोर्टें क्यों? किस रिपोर्ट के आधार पर कार्रवाई हुई? किस रिपोर्ट में केंद्र को वैध बताया गया? और किस अधिकारी ने किस दस्तावेज का सत्यापन किया?
इन सवालों का जवाब विभाग को देना ही होगा।
पीसी पीएन डीटी अपील संख्या 26/2025: अपील लंबित है तो क्या संचालन की भी खुली छूट मिल गई?। लक्ष्मी डायग्नोस्टिक सेंटर की स्वामिनी श्रीमती कंचन शुक्ला की ओर से विभाग को दिए गए जवाब में उल्लेख किया गया कि राज्य समुचित प्राधिकरण, पीसीपीएनडीटी अधिनियम 1994, लखनऊ में विविध अपील संख्या 26/2025 दाखिल की गई है और मामला वहां लंबित है। इसलिए जनपद स्तर से कार्रवाई संभव नहीं होने की बात कही गई।
लेकिन यहां एक बुनियादी कानूनी सवाल उठता है।
क्या केवल अपील दाखिल कर देने से किसी संस्थान को स्वतः संचालन की अनुमति मिल जाती है? क्या संबंधित प्राधिकरण या न्यायालय ने कोई ऐसा स्थगन आदेश अथवा अंतरिम राहत दी है, जिसके आधार पर केंद्र को बिना रजिस्ट्रेशन संचालन की छूट मिली हो? अगर ऐसा कोई आदेश है तो उसकी प्रति सार्वजनिक क्यों नहीं की जाती? और अगर कोई स्थगन आदेश नहीं है तो केवल अपील लंबित होने का हवाला देकर कार्रवाई से बचा कैसे जा सकता है? अपील लंबित होना और संचालन की वैध अनुमति होना दो अलग-अलग कानूनी बातें हैं। विभाग को संबंधित आदेश और पंजीकरण की शर्तों के आधार पर स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए।
एक सितंबर से पंजीकरण वैध, लेकिन किस काम के लिए?
दूसरी ओर, उपलब्ध विभागीय जानकारी के अनुसार लक्ष्मी क्लीनिंग सेंटर, स्वामिनी श्रीमती कंचन शुक्ला का पंजीकरण 01 सितंबर 2026 से 30 अप्रैल 2027 तक वैध बताया गया है।
लेकिन यहां भी सवाल खत्म नहीं होते, बल्कि शुरू होते हैं।
शिकायतकर्ता का दावा है कि लक्ष्मी डायग्नोस्टिक सेंटर अब लक्ष्मी क्लीनिक के नाम से संचालित हो रहा है। ऐसे में विभाग को यह स्पष्ट करना चाहिए कि 01 सितंबर 2026 से जारी पंजीकरण किस संस्थान, किस परिसर और किन विशिष्ट चिकित्सकीय जांच सेवाओं के लिए है? क्या पंजीकरण केवल क्लीनिक संचालन के लिए है या अल्ट्रासाउंड सहित अन्य जांचों की भी अनुमति है? क्या पीसी पी एन डीटी अधिनियम के तहत आवश्यक अलग पंजीकरण और अनुमति मौजूद है? क्योंकि किसी संस्थान का सामान्य पंजीकरण होना अपने आप हर प्रकार की जांच करने का लाइसेंस नहीं बन जाता। अब देखना यह है कि स्वास्थ्य विभाग दस्तावेजों की वास्तविक जांच करता है या केवल पंजीकरण की तारीख दिखाकर पूरे मामले पर पर्दा डाल देता है।
16 से 30 नवंबर का जांच अभियान: टीम में पूरा लश्कर, अब ईमानदारी की परीक्षा!
स्वास्थ्य विभाग के आगामी विशेष जांच अभियान में चिकित्साधिकारी, अग्निशमन विभाग, बायोमेडिकल वेस्ट से जुड़े अधिकारी, डिप्टी सीएमओ, सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों के अधीक्षक और थाना पुलिस तक को शामिल किया गया है। यानी इस बार जांच टीम का ढांचा भी पूरा सरकारी लश्कर वाला है। सवाल सिर्फ इतना है कि इस लश्कर की नजर नियम तोड़ने वाले अस्पतालों पर रहेगी या जांच के नाम पर 'चाय-पानी' की व्यवस्था तलाशने में ही समय निकल जाएगा? स्थानीय लोगों का कहना है कि स्वास्थ्य विभाग में पहले भी कई बार जांच अभियान चले, अस्पताल सील हुए और कार्रवाई की खबरें आईं, लेकिन कुछ मामलों में कुछ समय बाद दोबारा संचालन शुरू होने की शिकायतें सामने आती रहीं। ऐसे में जनता का सवाल है कि क्या इस बार बिना पंजीकरण वाले अस्पतालों पर मुकदमे दर्ज होंगे? क्या झोलाछाप चिकित्सकों पर कार्रवाई होगी? क्या अवैध अल्ट्रासाउंड केंद्रों के खिलाफ प्रभावी कदम उठेंगे? और सबसे जरूरी, क्या जांच टीम के सदस्यों की कार्यशैली की भी निगरानी होगी?
अब अधीक्षक की जांच कौन करेगा?
लक्ष्मी डायग्नोस्टिक सेंटर प्रकरण में शिकायतकर्ता द्वारा लगाए गए आरोपों और विभागीय रिपोर्टों के बीच कई ऐसे सवाल हैं, जिनका जवाब सार्वजनिक होना चाहिए। पहली जांच में संचालक द्वारा सहयोग नहीं किए जाने की बात लिखने के बाद क्या कार्रवाई हुई, 29 जून 2026 को तीन केंद्रों की संयुक्त जांच के बाद तीनों की अलग-अलग रिपोर्ट और कार्रवाई का विवरण क्या है। डॉ. ओपी त्रिपाठी की डिग्री और संबद्धता किन-किन संस्थानों में दर्ज है और क्या सभी जगह उनकी उपस्थिति नियमानुसार है।पी सी पी एन डीटी अपील संख्या 26/2025 में क्या कोई स्थगन आदेश या अंतरिम राहत जारी हुई है। सीएमओ कार्यालय कथित मासिक वसूली और संरक्षण के आरोपों की जांच किसी स्वतंत्र अधिकारी से कराया जाएगा?
फिलहाल सवाल सिर्फ झोलाछाप डॉक्टरों का नहीं, बल्कि उन अधिकारियों की जवाबदेही का भी है, जिनके हाथ में जांच की कलम है।
क्योंकि जब जांच करने वालों की निष्पक्षता पर ही सवाल उठने लगें, तो मरीजों का इलाज कौन करेगा और व्यवस्था का इलाज कौन करेगा । अब देखना यह है कि 16 से 30 नवंबर तक चलने वाला विशेष जांच अभियान अवैध क्लीनिकों और अस्पतालों का असली इलाज करता है या फिर विभाग के कथित 'मासिक वसूली तंत्र' की सेहत सुधारने का एक और अवसर बनकर रह जाता है! जनता को इस बार सीलिंग की फोटो नहीं, कार्रवाई का परिणाम चाहिए। मुकदमे की घोषणा नहीं, मुकदमे का प्रमाण चाहिए। और सबसे बढ़कर जांच के नाम पर खानापूर्ति नहीं, निष्पक्ष जांच चाहिए।
What's Your Reaction?
Like
0
Dislike
0
Love
0
Funny
0
Angry
0
Sad
0
Wow
1