प्रेस क्लब' का दंगल: जब कुर्सी के चक्कर में खो गया कागजों का बैग और रजिस्टर साहब के सामने खुल गए सारे राज!
अंबेडकरनगर/यहाँ 'प्रेस क्लब जिला अंबेडकरनगर' की कुर्सी को लेकर जो महाभारत छिड़ी है, उसे देखकर लगता है कि एकता कपूर के सीरियल्स भी फेल हो जाएं! तथाकथित प्रेस क्लब अध्यक्ष शैलेंद्र तिवारी और विपक्षी खेमे के बीच डिप्टी रजिस्ट्रार के यहाँ चल रहा यह मुकाबला किसी कोर्टरूम ड्रामा से कम नहीं है, जहाँ कागजों के तीर और गबन के गोले एक-दूसरे पर धड़ल्ले से दागे जा रहे हैं।
गायब होता बैग और 5 माह का 'सस्पेंस'
विपक्ष का सबसे गंभीर और मजेदार आरोप यह है कि प्रेस क्लब के सारे जरूरी दस्तावेज (डॉक्यूमेंट्स) से भरा एक बैग रास्ते में कहीं 'खो' गया। सवाल ये है भाई साहब, जब बैग गिरा था, तो तुरंत थाने में एफआईआर (FIR) दर्ज करवाने के बजाय पूरे 5 माह का लंबा इंतजार क्यों किया गया? जब डिप्टी रजिस्ट्रार साहब ने पूरा हिसाब-किताब मांगा, तब अचानक से 'रास्ते में बैग गिरने' की थ्योरी बाहर आ गई! पत्रकारों ने रजिस्टर के सामने यह सवाल भी दागा कि जब इलेक्शन से पहले ही फाइल गायब थी, तो बिना दस्तावेजों के चुनाव कैसे करा लिया गया?
सालों-साल का हिसाब और 'चंदे' का चक्कर
विपक्ष का आरोप है कि साल 2006-07 से लेकर अब तक बिना किसी कायदे के चुनाव कराए ही संस्था चलाई जा रही है। फर्जीवाड़े का आरोप चंदे के रूप में आई भारी-भरकम रकम पर व्यक्तिगत रूप से हाथ साफ करने के आरोप लग रहे हैं, जिससे तथाकथित अध्यक्ष जी की कुर्सी हिल गई है। बैंक खाते का खेल तथाकथित अध्यक्ष जी पर यह भी आरोप है कि प्रेस क्लब के पैसे को अपने निजी खाते में घुमाया गया। अगर सदस्यता शुल्क और चंदे का पैसा पर्सनल अकाउंट में रखा गया है, तो यह सीधे तौर पर गबन की श्रेणी में आता है। पत्रकारों की मांग है कि 2007 से अब तक का पूरा बैंक स्टेटमेंट निकाला जाए और निष्पक्ष जांच हो।
लेटर पैड का रुतबा और डिप्टी रजिस्ट्रार के सख्त तेवर
विपक्ष का कहना है कि जब तक चुनाव कायदे से रजिस्टर्ड न हो जाएं, तब तक 'प्रेस क्लब' के लेटर पैड और अध्यक्ष पद के ठप्पे का इस्तेमाल करना नियमों के खिलाफ है। लेकिन तथाकथित अध्यक्ष शैलेंद्र तिवारी भी पीछे हटने को तैयार नहीं हैं; उनका कहना है कि 5 जुलाई 2026 को हुए चुनाव एकदम सॉलिड और सबकी सहमति से हुए हैं, इसलिए सारी आपत्तियां खारिज की जाएं! दूसरी तरफ, डिप्टी रजिस्ट्रार साहब के तेवर एकदम सख्त हैं। अधूरे अभिलेख देखकर उनकी नाराजगी साफ जाहिर हो गई है। जब रजिस्टर साहब ने कागजात मांगे, तो तथाकथित अध्यक्ष जी का जवाब बड़ा दिलचस्प था— मामले को यहीं समाप्त किया जाए, मैं अभिलेख नहीं दे पाऊंगा! इस पर डिप्टी रजिस्ट्रार ने दो टूक कह दिया कि इसे लिखित में दो, तभी आगे की कार्रवाई होगी। अब मामला बीच मझधार में लटका हुआ है। तथाकथित अध्यक्ष शैलेंद्र तिवारी के लिए यह रास्ता आने वाले दिनों में भारी मुसिबतें खड़ी कर सकता है, क्योंकि कागजों की कमी और बैंक खातों का झोल उन्हें सीधे सलाखों के पीछे का रास्ता भी दिखा सकता है।अब देखना दिलचस्प होगा कि क्या प्रेस क्लब में ताला लगेगा या तथाकथित अध्यक्ष जी को सचमुच जेल की हवा खानी पड़ेगी!
What's Your Reaction?
Like
0
Dislike
1
Love
0
Funny
0
Angry
0
Sad
0
Wow
0