अम्बेडकर नगर: अकबरपुर नगर पालिका में तानाशाही का बोलबाला,मजदूरों की पसीने की कमाई पर ठेकेदारों की खुली लूट,अधिकारियों की चुप्पी बनी सबसे बड़ा सवाल
अम्बेडकरनगर/अकबरपुर, अचल वार्ता। नगर पालिका परिषद अकबरपुर इन दिनों एक ऐसी तानाशाही व्यवस्था का प्रतीक बन चुका है, जहां लोकतंत्र, अधिकार और पारदर्शिता जैसे शब्द सिर्फ दीवारों पर लिखे मिलते हैं, जमीन पर नहीं। लगभग 600 निविदा कर्मचारी, जो शहर की सफाई से लेकर नालों की दुर्गंध और गंदगी से रोजाना लड़ते हैं, उन्हीं के अधिकारों को सबसे ज्यादा रौंदा जा रहा है।हर कर्मचारी के पीएफ से प्रतिमाह लगभग ₹1500 काटे जाते हैं, जो तीन महीने में करीब 27 लाख रुपये बनते हैं—यह राशि कर्मचारियों के भविष्य की सुरक्षा के लिए होती है, पर हकीकत में यही रकम ठेकेदारों और सिक्योरिटी एजेंसी के लिए सोने की खान बन चुकी है।यह भुगतान मानी जानी सिक्योरिटी/रेखा सिक्योरिटी एजेंसी के माध्यम से होना बताया जाता है, लेकिन तीन-तीन महीनों तक कर्मचारियों का पीएफ रोका जाना अब “रूटीन प्रोसेस” बना दिया गया है।
डर और धमकी का माहौल—आवाज उठाना मतलब नौकरी से बाहर का रास्ता
कर्मचारी बताते हैं कि वे पीएफ कटने और बकाया भुगतान की शिकायत दर्ज कराना चाहते हैं, लेकिन नगर पालिका में किसी अधिकारी के कक्ष में जाना अब उनके लिए जोखिम बन चुका है।
शिकायत पर समाधान नहीं, बल्कि चेतावनी मिलती है “ज्यादा बोलोगे तो अगले दिन से काम बंद समझो।”
ठेकेदार की मौज, अधिकारी तमाशबीन
जब मजदूर कड़कड़ाती ठंड में नालों में उतरकर सफाई करते हैं, तब ठेकेदार दफ्तर में बैठकर उन्हीं के भविष्य निधि के पैसों से मुनाफा कमा रहे हैं।प्रश्न यह भी है कि तीन-तीन महीने तक पीएफ रोके जाने के बावजूद विभागीय अधिकारी खामोश क्यों हैं?क्या यह खामोशी सिर्फ लापरवाही है या फिर मिलीभगत?
मजदूरों का दर्द—शहर को चमकाते हैं, पर उनका भविष्य अंधेरे में
अकबरपुर शहर की सड़कों को स्वच्छ और सुरक्षित रखने वाले ये मजदूर कहते हैं कि उनकी मजबूरी इतनी बड़ी है कि आवाज उठाने से पहले ही “नौकरी जाने का डर” उन्हें चुप करा देता है।
यह वह कहानी है, जहां गरीब मजदूर शहर को बीमारियों से बचाते हैं, पर खुद अपने हक से वंचित रह जाते हैं।जहां लोकतंत्र की बातें होती हैं, वहीं मजदूरों की आवाज दबा दी जाती है।जहां अधिकारों की रक्षा करने वाले अधिकारी बैठे हैं, वहीं खुलेआम लूट का खेल चल रहा है।जवाबदेही कौन लेगा?कब तक मजदूर डर के साए में काम करते रहेंगे?कब तक उनकी भविष्य निधि ठेकेदारों की जेब भरती रहेगी?जनता के पैसे और मजदूरों की कमाई को अपनी कमाई समझने वाले इन जिम्मेदारों पर कार्रवाई कौन करेगा?
अकबरपुर के मजदूरों की इस जमीनी लड़ाई का जवाब अब शहर को, व्यवस्था को और जिम्मेदारों को देना होगा।क्योंकि यह सिर्फ शोषण की कहानी नहीं—यह लोकतंत्र की असली परीक्षा है।
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