पुराने काम पर ‘रिपेयर’ की नई मलाई! सारंगपुर में लाखों के खेल का आरोप, सचिव की पुरानी फाइलें फिर चर्चा में
कटेहरी (अम्बेडकरनगर) अचल वार्ता। ग्राम पंचायतों में विकास कार्य जमीन पर कितना हुआ और सरकारी वेबसाइट पर कितना चमका इसका हिसाब कभी-कभी बड़ा दिलचस्प होता है। कटेहरी ब्लॉक क्षेत्र की ग्राम पंचायत सारंगपुर में ग्राम सचिव मांडवी उपाध्याय और ग्राम प्रधान की भूमिका को लेकर अब ऐसे ही सवाल उठने लगे हैं। वेबसाइट पर अपलोड कार्यों और उपलब्ध विवरणों को देखकर आरोप लगाया जा रहा है कि पुराने कार्यों को ‘रिपेयर/मरम्मत’ के नाम पर दोबारा दिखाकर सरकारी धन के भुगतान का रास्ता तो नहीं बनाया गया! मामला इसलिए भी चर्चा में है क्योंकि यदि पुराने कार्य वास्तव में मौजूद हैं और उन्हीं पर बार-बार मरम्मत के नाम पर भुगतान हुआ है, तो अभिलेखों की जांच में प्रशासनिक ‘रिपेयरिंग’ की पूरी कहानी सामने आ सकती है।
पुराना अध्याय भी कम दिलचस्प नहीं!
बताया जा रहा है कि ग्राम सचिव मांडवी उपाध्याय करीब चार वर्ष पहले विकासखंड टांडा क्षेत्र में तैनात थीं। उस दौरान उनके जिम्मे रहे ग्राम पंचायतों में सरकारी धन के कथित दुरुपयोग को लेकर जांच हुई थी। शिकायतों और जांच से जुड़े दावों के अनुसार करीब 15 लाख रुपये के गबन की पुष्टि किए जाने की बात सामने आई थी। अब सवाल यह है कि यदि पूर्व में सरकारी धन के दुरुपयोग का मामला जांच में सामने आया था, तो संबंधित सचिव को दोबारा महत्वपूर्ण ग्राम पंचायतों का दायित्व कैसे मिला? क्या विभागीय स्तर पर कार्रवाई पूरी हुई थी? यदि हुई तो उसका परिणाम क्या रहा? और यदि नहीं हुई तो जिम्मेदारी किसकी है?
कागज पर रिपेयर, जमीन पर वही ढांचा!’
सारंगपुर की तस्वीरें और वेबसाइट पर दर्ज कार्यों का मिलान कराया जाए तो असली कहानी सामने आ सकती है। ग्रामीणों का आरोप है कि जिन कार्यों की स्थिति पहले से खराब अथवा अधूरी बताई जा रही है, उन्हीं पर मरम्मत के नाम पर धन खर्च किए जाने के दावों की जांच जरूरी है। यानी गांव में सवाल खड़ा है—काम नया है या पुराने काम को ही ‘रिपेयर’ करके फाइल में नया रूप दिया गया है?
जांच हुई तो खुल सकता है ‘रिपेयर का राज’
मामले में ई-ग्राम स्वराज पर अपलोड फोटो, कार्य की स्वीकृति, तकनीकी एवं प्रशासनिक स्वीकृति, एस्टीमेट, एमबी, भुगतान वाउचर, बिल-बाउचर और भुगतान की तारीख का मौके पर हुए कार्य से मिलान कराया जाना जरूरी है। साथ ही पुराने कार्यों और कथित मरम्मत कार्यों की तस्वीरों का भी तुलनात्मक परीक्षण कराया जाए तो स्थिति काफी स्पष्ट हो सकती है। फिलहाल यह पूरा मामला आरोपों और उपलब्ध ऑनलाइन विवरणों के आधार पर जांच का विषय है। आरोप सही हैं या नहीं, इसका अंतिम निष्कर्ष सक्षम अधिकारी की अभिलेखीय एवं स्थलीय जांच के बाद ही निकल सकता है। अब देखने वाली बात यह है कि अधिकारी सारंगपुर की फाइलों की ‘रिपेयरिंग’ खोलकर असली हिसाब सामने लाते हैं या फिर जांच की फाइल भी सरकारी दफ्तरों की पुरानी अलमारी में जाकर कुंभकरणी नींद सो जाती है।
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