व्यंग्य : सांड टंकी पर और व्यवस्था नीचे मुस्तैद

श्योपुर के ददूनी गांव में एक सांड 60 फीट ऊंची पानी की टंकी पर चढ़ गया और 42 घंटे तक वहीं डटा रहा। पुलिस, प्रशासन और पशुपालन विभाग की टीम ने क्रेन की मदद से सांड को सुरक्षित नीचे उतारा।

Sep 21, 2026 - 20:12
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व्यंग्य : सांड टंकी पर और व्यवस्था नीचे मुस्तैद

   "ज़नाब अपनी समस्याओं को सुलझाने के लिए या उसका समाधान खोजने के लिए सिर्फ मनुष्य ही नहीं जानवर भी आजकल टंकी पर चढ़ने का कार्यक्रम करने लगे हैं हालांकि यह उनके लिए रिस्की है।"

 यह तो अच्छा हुआ कि वह टंकी जर्जर नहीं थी। अन्यथा कुछ का कुछ हो जाता। पानी की टंकी पर सिर्फ "शोले" फ़िल्म के वीरु का बसंती को पाने के लिए चढ़ना सबको आज भी याद है। पानी की टंकी पर मानव मात्र के चढ़ने का एकाधिकार अब खत्म हो गया है। लेकिन कभी-कभी मूक प्राणी भी अपने मन की करते हैं, यह बात अलग है कि वह हमको समझ में नहीं आता और न आएगा। अब यह तो मूक प्राणियों की भाषा समझने वाला ही बता सकता है कि सांड टंकी पर क्यों चढ़ा?  

 श्योपुर के ददूनी गांव में एक सांड 60 फीट ऊंची पानी की टंकी पर जा चढ़ा। नीचे गांव वाले खड़े थे, ऊपर सांड था और बीच में एक ऐसा सवाल था—“अब इसे नीचे कौन उतारेगा?”

 असल में सांड को शायद नीचे की दुनिया से कुछ शिकायत रही होगी। सोचा होगा-“जब सबको ऊपर जाने की इतनी जल्दी है, तो मैं भी देखूं कि ऊपर पहुंचकर कैसा लगता है!” लेकिन ऊपर पहुंचने के बाद उसे पता चला कि ऊंचाई हासिल करना आसान है, वापसी की व्यवस्था थोड़ी मुश्किल है।

 यारों 42 घंटे तक सांड टंकी पर डटा रहा। नीचे लोग तमाशा देखते रहे, सलाह देते रहे और उम्मीद करते रहे कि सांड खुद समझदारी दिखाएगा। सांड ने भी शायद तय कर लिया था कि “जब मामला इतना चर्चित हो गया है, तो अब बिना सरकारी इंतजाम के नीचे क्यों? उतरूं?”

 आखिरकार पुलिस, पशुपालन विभाग और प्रशासन की टीम पहुंची। क्रेन मंगाई गई और करीब दो घंटे के ऑपरेशन के बाद सांड को सुरक्षित नीचे उतार लिया गया। इस पूरे घटनाक्रम में एक दिलचस्प बात यह रही कि

 सांड ऊपर था, लेकिन असली परीक्षा नीचे खड़े तंत्र की हो रही थी। लोकतंत्र में भी कुछ ऐसा ही है। कोई समस्या छोटी हो तो लोग उसे नजरअंदाज कर देते हैं। समस्या थोड़ी बड़ी हो जाए तो चर्चा शुरू होती है। अपनी तो इतनी ऊंचाई सुनकर ही पुंगी बज जाती है। जब वह 60 फीट ऊपर चढ़ जाए, तब बैठक, निरीक्षण, टीम, योजना और ऑपरेशन सब शुरू हो जाते हैं।

हालांकि यह भी मानना पड़ेगा कि प्रशासन ने आखिरकार मोर्चा संभाला और सांड को सुरक्षित नीचे उतार लिया।

 यानी व्यवस्था पूरी तरह बेबस भी नहीं है- बाबू, कुछ भी कहो मुस्तेदी बड़ी जबरदस्त है। बस कभी-कभी उसे समस्या की ऊंचाई देखकर अपनी ऊंचाई तय करनी पड़ती है। इस सांड के रेस्क्यू ने एक और राजनीतिक-सा, मगर गैर-दलीय संदेश दिया-ऊपर पहुँच जाना उपलब्धि हो सकती है, लेकिन नीचे सुरक्षित लौटाना असली प्रबंधन है।

 भइये सांड अब जमीन पर है। टंकी खाली है। क्रेन वापस जा चुकी है। गांव वालों की चिंता भी खत्म हो गई। लेकिन इस घटना ने एक मजेदार सवाल जरूर छोड़ दिया हैं, अगर एक सांड को 60 फीट की ऊंचाई से नीचे उतारने में 42 घंटे लग सकते हैं, तो जो समस्याएं वर्षों से व्यवस्था की ऊंची टंकियों पर बैठी हैं, उनके लिए क्रेन कब आएगी? फिलहाल सांड ने तो अपना काम कर दिया। वो ऊपर चढ़ा, सबका ध्यान खींचा और सुरक्षित नीचे भी आ गया। अब बारी हमारी है कि हम उससे कम से कम इतना तो सीखें कि ऊंचाई चाहे कितनी भी हो, नीचे उतरने का रास्ता पहले से पता होना चाहिए। अन्यथा सबको क्रेन उपलब्ध हो जाए ये जरूरी नहीं!

- संजय एम तराणेकर

(कवि, लेखक व समीक्षक)

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