सीतापुर की धरती का गौरव: डॉ. राम बख्श सिंह ने दशकों पहले दिया था ऊर्जा संकट का समाधान
सीतापुर, अचल वार्ता। आज जब देश और दुनिया ऊर्जा संकट से जूझ रही है और सरकारें पारंपरिक ईंधनों के विकल्प तलाश रही हैं, ऐसे समय में सीतापुर जनपद के विश्वविख्यात वैज्ञानिक स्वर्गीय डॉ. राम बख्श सिंह का योगदान एक बार फिर प्रासंगिक हो उठा है। जिस बायोगैस (गोबर गैस) को आज स्वच्छ और टिकाऊ ऊर्जा समाधान के रूप में बढ़ावा दिया जा रहा है, उसकी दिशा में डॉ. राम बख्श सिंह ने दशकों पहले ही महत्वपूर्ण पहल कर दी थी।
जानकारी के अनुसार, डॉ. राम बख्श सिंह ने वर्ष 1957 में सीतापुर में भारत का पहला सफल गोबर गैस संयंत्र स्थापित कर ग्रामीण ऊर्जा के क्षेत्र में नई दिशा दी थी। उस समय यह पहल न केवल वैज्ञानिक दृष्टि से महत्वपूर्ण थी, बल्कि ग्रामीण भारत को सस्ती और स्वच्छ ऊर्जा उपलब्ध कराने की दिशा में भी एक क्रांतिकारी कदम थी।
वर्तमान समय में पारंपरिक ईंधनों जैसे एलपीजी और पेट्रोलियम उत्पादों पर बढ़ती निर्भरता, आपूर्ति संबंधी समस्याएं और कीमतों में उतार-चढ़ाव के कारण वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों की आवश्यकता लगातार बढ़ रही है। इसी को देखते हुए उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा भी गोबर गैस संयंत्रों को बड़े स्तर पर बढ़ावा देने की योजना पर कार्य किया जा रहा है, जिससे ग्रामीण क्षेत्रों में स्वच्छ ऊर्जा को बढ़ावा मिल सके।
डॉ. राम बख्श सिंह ने अपने लगभग 40 वर्षों के शोध और नवाचार के माध्यम से न केवल भारत में बल्कि विश्व के 15 से अधिक देशों में बायोगैस तकनीक के विकास और प्रसार में अहम भूमिका निभाई। उनके प्रयासों से बायोगैस को एक व्यवहारिक, सस्ता और पर्यावरण-अनुकूल ऊर्जा विकल्प के रूप में स्थापित करने में मदद मिली।
विशेष रूप से 1970 के दशक में आए वैश्विक ऊर्जा संकट के दौरान भी डॉ. राम बख्श सिंह ने बायोगैस को स्वदेशी, स्वच्छ और टिकाऊ ऊर्जा विकल्प के रूप में प्रस्तुत किया था। आज जब दुनिया फिर से ऊर्जा संकट और पर्यावरणीय चुनौतियों का सामना कर रही है, तब उनका वही दृष्टिकोण अत्यंत प्रासंगिक साबित हो रहा है।
सीतापुर जनपद के लिए यह गर्व का विषय है कि इस भूमि ने ऐसे वैज्ञानिक को जन्म दिया, जिनकी दूरदर्शी सोच आज भी राष्ट्रीय ऊर्जा नीतियों और टिकाऊ ऊर्जा समाधानों को दिशा दे रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि डॉ. राम बख्श सिंह के योगदान को व्यापक स्तर पर जन-जन तक पहुंचाने की आवश्यकता है, ताकि आने वाली पीढ़ियां उनके कार्यों से प्रेरणा लेकर आत्मनिर्भर और पर्यावरण-अनुकूल ऊर्जा व्यवस्था की दिशा में आगे बढ़ सकें।
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