बस्ती: दृष्टिहीन रामपाल अपनी दिव्य अनुभूति से गढ़ते हैं मां दुर्गा का स्वरूप, 42 साल से बना रहे मूर्तियां

दृष्टिहीन मूर्तिकार रामपाल 42 वर्षों से अपने हाथों के स्पर्श और कल्पना के सहारे मां दुर्गा की प्रतिमाएं बना रहे हैं। जानिए उनके संघर्ष, कला और प्रेरणादायक कहानी के बारे में।

Oct 10, 2026 - 09:59
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बस्ती: दृष्टिहीन रामपाल अपनी दिव्य अनुभूति से गढ़ते हैं मां दुर्गा का स्वरूप, 42 साल से बना रहे मूर्तियां

बस्ती, अचल वार्ता। कहते हैं कि कला किसी की मोहताज नहीं होती। यदि मन में लगन, श्रद्धा और दृढ़ इच्छाशक्ति हो तो शारीरिक सीमाएं भी प्रतिभा का रास्ता नहीं रोक सकतीं। इसकी मिसाल पश्चिम बंगाल के रहने वाले दृष्टिहीन मूर्तिकार रामपाल हैं, जो अपनी आंखों से देख नहीं सकते, लेकिन अपनी दिव्य अनुभूति और स्पर्श के सहारे मां दुर्गा की मनमोहक मूर्तियां तैयार करते हैं। पिछले 42 वर्षों से मूर्तिकला के क्षेत्र में सक्रिय रामपाल अपनी कला के माध्यम से लोगों को आश्चर्यचकित कर रहे हैं।

रामपाल बस्ती के बहुरहवा चौराहे पर हर साल मां दुर्गा की प्रतिमाएं तैयार करते हैं। उनकी बनाई मूर्तियों में चेहरे की बनावट, भाव-भंगिमा और प्रतिमा का स्वरूप उनकी कल्पनाशीलता और वर्षों के अनुभव को दर्शाता है।

चार साल की उम्र में ही चली गई थी आंखों की रोशनी

रामपाल के जीवन की कहानी संघर्ष और आत्मविश्वास की मिसाल है। उनके पिता विनय कृष्ण पाल ने उन्हें महज चार साल की उम्र में ही मूर्तियां बनाना सिखाना शुरू कर दिया था। रामपाल जन्म से ही देख नहीं सकते थे, लेकिन परिवार ने उनकी प्रतिभा को पहचाना और उन्हें कला के क्षेत्र में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया।

आंखों से दुनिया को न देख पाने के बावजूद रामपाल अपनी कल्पना और स्पर्श के जरिए मूर्तियों का आकार तैयार करते हैं। उनके लिए मिट्टी केवल एक साधारण पदार्थ नहीं, बल्कि अपनी भावनाओं और श्रद्धा को आकार देने का माध्यम है।

हाथों के स्पर्श से तैयार करते हैं मां दुर्गा की प्रतिमाएं

रामपाल बताते हैं कि मूर्तियां बनाने के शुरुआती दिनों में उन्हें काफी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। हथौड़ी-छेनी और अन्य औजारों का इस्तेमाल करते समय कई बार चोट भी लग जाती थी। मूर्ति बिगड़ जाने पर उसे दोबारा बनाने की चुनौती भी सामने आती थी।

इसके बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी। लगातार अभ्यास और अनुभव के सहारे उन्होंने मिट्टी को आकार देने की कला में महारत हासिल कर ली। आज वह अपने हाथों के स्पर्श से मूर्तियों की बनावट और स्वरूप का अंदाजा लगा लेते हैं।

रामपाल की कला की खासियत यह है कि वह मूर्तियों को आकार देने के लिए हानिकारक रंगों और प्लास्टर ऑफ पेरिस जैसी सामग्री के इस्तेमाल से भी परहेज करते हैं।

42 साल से मूर्तिकला को बना रखा है आजीविका का आधार

रामपाल पिछले 42 वर्षों से मूर्तियां बना रहे हैं। कोलकाता में उनके परिवार के अलावा आसपास के कई लोग भी इस पारंपरिक काम से जुड़े हुए हैं। उन्होंने अपने जीवन में अब तक सैकड़ों प्रतिमाएं तैयार की हैं। उनकी बनाई मूर्तियों की मांग विभिन्न स्थानों पर रहती है और कई प्रतिमाओं की बुकिंग पहले से हो जाती है।

मूर्तियां बनाने से होने वाली कमाई से उनके परिवार का खर्च चलता है। हर साल दुर्गा पूजा के अवसर पर उनका काम बढ़ जाता है और वह पूरी लगन के साथ प्रतिमाओं को अंतिम रूप देने में जुट जाते हैं।

परिवार का सहयोग बना ताकत

रामपाल की इस उपलब्धि के पीछे उनके परिवार का भी महत्वपूर्ण योगदान है। मूर्तियां बनाने की कला सीखने से लेकर उसे आगे बढ़ाने तक परिवार ने उनका साथ दिया। पत्नी कंचना, बेटे सौरभ और बहू भी इस पारंपरिक कला से जुड़े काम में सहयोग करते हैं।

रामपाल हर साल बैसाख के महीने में बस्ती के बहुरहवा पहुंचते हैं और अप्रैल-मई से मूर्तियां बनाने का काम शुरू कर देते हैं। मिट्टी तैयार करने, उसे गूंथने, मूर्तियों का ढांचा बनाने और अंतिम रूप देने तक वह अपने अनुभव का इस्तेमाल करते हैं।

दिव्य अनुभूति और दृढ़ इच्छाशक्ति की मिसाल हैं रामपाल

रामपाल की कहानी बताती है कि सफलता केवल आंखों से दुनिया देखने पर निर्भर नहीं करती। आत्मविश्वास, मेहनत, निरंतर अभ्यास और परिवार का सहयोग हो तो कठिन से कठिन लक्ष्य भी हासिल किया जा सकता है।

मां दुर्गा की प्रतिमाओं को अपने स्पर्श और कल्पना से आकार देने वाले रामपाल आज उन लोगों के लिए प्रेरणा हैं, जो किसी शारीरिक चुनौती के कारण अपने सपनों को अधूरा मान लेते हैं। उनकी कला न केवल आस्था का प्रतीक है, बल्कि यह संदेश भी देती है कि प्रतिभा के सामने शारीरिक सीमाएं छोटी पड़ जाती हैं।

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