मुख्यमंत्री जनसुनवाई पोर्टल (IGRS) बना मात्र औपचारिकता असंतुष्ट फीडबैक के बावजूद CDO बिना जांच BDO की पुरानी आख्या को दी हरी झंडी
अम्बेडकरनगर अचल वार्ता। जब जिले में नवागत मुख्य विकास अधिकारी (CDO) ने कुर्सी संभाली थी, तब आम जनता को लगा था कि अब भ्रष्टाचार की परतों पर जमी धूल छटेगी और बेलगाम अधिकारियों-सचिवों पर गाज़ गिरेगी। लेकिन हकीकत यह रही कि वही पुरानी ‘कागजी जलेबी’ एक बार फिर तलकर जनता के सामने परोस दी गई। मामला विकास खंड कटेहरी की ग्राम पंचायत सारंगपुर का है। जब शिकायतकर्ता ने बीडीओ (BDO) की जांच रिपोर्ट पर असंतुष्ट फीडबैक दिया, तो नियमानुसार किसी उच्च स्तरीय अधिकारी से निष्पक्ष जांच कराने के बजाय CDO कार्यालय ने BDO की उसी पुरानी घिसी-पिटी रिपोर्ट को सत्य मानकर मामले का निस्तारण कर दिया। कटेहरी से भ्रष्टाचार निवारण की एक ऐसी अद्भुत और चमत्कारी कहानी सामने आई है, जिसे पढ़कर लगता है मानो पूरा ‘ताजमहल’ कटेहरी में ही उतर आया हो! बस फर्क इतना है कि जमीन पर झांकने पर केवल धूल ही उड़ती दिखती है। तीन जांच-ब्रह्मास्त्रों का जादुई खेल! ग्राम पंचायत प्रतापपुर चमुर्खा में भी विकास कार्यों की निष्पक्ष जांच के लिए शासन के वहीं तीन धुरंधर अधिकारियों—सहायक विकास अधिकारी (ग्राम विकास) अनिल कुमार सिंह, ग्रामीण अभियंत्रण विभाग के अवर अभियंता अतुल मौर्य और लघु सिंचाई विभाग के अवर अभियंता रामजीत की एक विशेष टीम उतारी। इन कलयुगी जांच अधिकारियों ने अपनी जादुई दृष्टि से ऐसा कमाल दिखाया कि विवादों में घिरे ग्राम प्रधान और ग्राम सचिव पलक झपकते ही ‘दूध के धुले’ साबित हो गए थे! आइए नज़र डालते हैं इनकी जांच के कुछ नायाब करिश्मों पर इंटरलॉकिंग सड़क का डबल रोल मामला मामला सामुदायिक शौचालय से उमापति के घर तक इंटरलॉकिंग पर ₹1,88,500 तथा रोशनलाल के घर से सामुदायिक शौचालय तक ₹57,489 का भुगतान हुआ। जांच रिपोर्ट दोनों काम बिल्कुल अलग-अलग जगहों पर हुए और एकदम परफेक्ट पाए गए! हमारा सवाल जब फाइलें ही इतनी मजबूत थीं, तो ज़मीन पर फटकने की क्या जरूरत थी! फाइल की चिकनी सड़क पर चलना आसान होता है, असली सड़क पर तो गाड़ियां ही फिसलती हैं! ई-रिक्शा मरम्मत में जादुई डिस्काउंट
मामला: पंचायत के ई-रिक्शा लोडर की मरम्मत का। स्टेटमेंट में लागत ₹66,300 दर्शाई गई, लेकिन भुगतान ₹64,000 हुआ। जांच रिपोर्ट टीम ने वाहन का स्थलीय सत्यापन भी कर लिया।हमारा वहीं सवाल यह ₹2,300 का गणितीय गोलमोल क्या किसी जादुई डिस्काउंट का हिस्सा है या हिसाब की डायरी में नया फॉर्मूला ईजाद हुआ है। जनता जानना चाहती है कि इस बचत की बरकत आखिर किसके घर पहुँची!मिट्टी पटाई में डिजिटल ईमानदारी मामला भीमसेन के घर के सामने मिट्टी पटाई का। स्टेटमेंट बना ₹19,931 का और भुगतान हुआ ₹19,500 का! वाह रे ईमानदारी! ₹431 का यह भारी-भरकम अंतर देखकर तो बड़े-बड़े सीए (CA) भी माथा पकड़ लें। कहीं इसी जादुई बचत से तो देश की अर्थव्यवस्था नहीं चल रही है। आधा भुगतान, अधूरा अरमान मामला होलिका दहन से हनुमान मंदिर तक के कार्य में ₹3,69,692 का स्टेटमेंट बना, लेकिन भुगतान सिर्फ ₹1,65,000 हुआ। जांच का तर्क सचिव जी का कहना है कि खाते में कंगाली थी इसलिए बाकी पैसे नहीं दिए। जब लक्ष्मी जी बरसेंगी, तब भुगतान होगा। हमारा सवाल यानी काम का ‘ट्रेलर’ रिलीज हो चुका है। पूरी पिक्चर बजट आने पर रिलीज होगी! तब तक जनता हनुमान मंदिर के रास्ते पर भक्ति भाव से गड्ढों को ही निहारती रहे।
सबसे मजेदार मोड साहब असंतुष्ट, पर शिकायतकर्ता हवा में संतुष्ट!
इस पूरी जांच का सबसे दिलचस्प पहलू यह रहा कि एक तरफ रिपोर्ट दावा करती है कि शिकायतकर्ता फोन पर ही 'पूरी तरह संतुष्ट हो गया जबकि शिकायतकर्ता का कहना है कि उससे किसी ने संपर्क ही नहीं किया। वहीं दूसरी तरफ, समीक्षा करने वाले उच्च अधिकारी ने टिप्पणी ठोक दी कि— निस्तारण की गुणवत्ता से हम संतुष्ट नहीं हैं, इसमें सुधार करो! सीधा गणित जांच करने वाले अपनी पीठ थपथपा रहे हैं। शिकायतकर्ता हवा में ही संतुष्ट हो चुका है, लेकिन ऊपर बैठा साहब कह रहा है— अरे भाई थोड़ा ढंग का पर्दा डालो भ्रष्टाचार अभी थोड़ा-थोड़ा बाहर झांक रहा है! कटेहरी की इस जांच ने साबित कर दिया है कि फाइलों में विकास की इबारत लिखना और ज़मीन पर उसे उतारना दो बिल्कुल अलग-अलग दुनिया हैं। जब तक फाइल का हिसाब और ज़मीन का विकास आमने-सामने खड़े नहीं होंगे, तब तक जनता यूं ही इन कागजी जादूगरों के करिश्मे पर तालियाँ बजाने को मजबूर रहेगी। अब देखना यह है कि नवागत CDO साहब कागजी जलेबियों से बाहर निकलकर असल जांच का चाबुक कब चलाते हैं!
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