छप्पर वाले की ‘पक्की छत’ कट गई, 4000 वर्गफीट वाले की आवास सूची में एंट्री!
चंदापुर में प्रधानमंत्री आवास योजना का ‘गजब गणित’—शिकायत के बाद गरीब महिला का आवास निरस्त, शिकायतकर्ता पक्ष की पात्रता पर भी उठे सवाल
अम्बेडकरनगर। प्रधानमंत्री आवास योजना-ग्रामीण में पात्रता का गणित भी बड़ा दिलचस्प है—किसी के सिर पर छप्पर हो तो भी जांच में पक्का मकान दिखाई दे जाए और किसी के पास करीब 4000 वर्गफीट में मकान निर्माणाधीन होने का दावा हो तो नाम लाभार्थी सूची में दिखाई दे जाए! अब इसे सरकारी योजना का संयोग कहें या पात्रता का अनोखा हिसाब, भीटी विकासखंड के चंदापुर गांव में मामला सवाल खड़े कर रहा है। गांव की सीमा पत्नी श्रीनाथ मिश्रा अपने चार बच्चों के साथ छप्पर में रहकर जीवन गुजार रही हैं। पति वाहन चलाकर परिवार का खर्च उठाते हैं। ग्रामीणों के अनुसार सीमा का नाम प्रधानमंत्री आवास योजना-ग्रामीण के लाभार्थियों में आया था, लेकिन गांव निवासी रक्षाराम तिवारी की शिकायत के बाद उनका आवास निरस्त कर दिया गया। आरोप है कि शिकायत में सीमा के पास पहले से पक्का मकान होने की बात कही गई।
अब कहानी में ट्विस्ट यहीं से शुरू होता है।
जिस शिकायत के आधार पर सीमा का आवास कटने की बात सामने आ रही है, उसी शिकायतकर्ता पक्ष की पात्रता पर ग्रामीण सवाल उठा रहे हैं। ग्रामीणों का दावा है कि रक्षाराम तिवारी की पत्नी सुमन का नाम भी प्रधानमंत्री आवास योजना की सूची में लाभार्थी के रूप में दर्ज है। इतना ही नहीं, दावा किया जा रहा है कि उनके पास लगभग 4000 वर्गफीट में मकान निर्माणाधीन है, जिसकी दीवारें खड़ी हो चुकी हैं और छत का निर्माण शेष है। ग्रामीणों के मुताबिक सूची में सुमन पत्नी रक्षाराम का नाम क्रमांक 62 पर दर्ज है। ऐसे में गांव में अब चर्चा है कि प्रधानमंत्री आवास योजना की पात्रता का पैमाना आखिर क्या है—छप्पर देखकर पक्का मकान मान लिया जाता है या 4000 वर्गफीट का निर्माण देखकर भी पात्रता की घंटी बजती रहती है?
एक तरफ छप्पर, दूसरी तरफ निर्माणाधीन मकान—जांच का तराजू किस ओर झुकेगा?
मामला सिर्फ एक लाभार्थी का नहीं, बल्कि योजना की पात्रता और सत्यापन प्रक्रिया पर सवाल खड़े करता है। यदि सीमा के पास वास्तव में पक्का मकान नहीं है और वह छप्पर में रह रही हैं, तो शिकायत के आधार पर उनका नाम निरस्त किए जाने की प्रक्रिया की जांच जरूरी है। दूसरी ओर, यदि सुमन पत्नी रक्षाराम का नाम वास्तव में लाभार्थी सूची में दर्ज है और उनके परिवार के पास निर्माणाधीन मकान होने का दावा सही पाया जाता है, तो उनकी पात्रता की भी नियमानुसार जांच होना जरूरी है। यानी मामला साफ है—जिसके पास वास्तव में आवास नहीं, उसे आवास मिले और जो नियमों की कसौटी पर पात्र न हो, उसका नाम सूची से बाहर हो। आखिर प्रधानमंत्री आवास योजना कोई ऐसी लॉटरी तो है नहीं जिसमें पात्रता के बजाय शिकायत और सिफारिश का नंबर चले!
बीडीओ साहब से जवाब की घंटी बजी, लेकिन रिसीव नहीं हुई!
मामले को लेकर खंड विकास अधिकारी भीटी राजेंद्र कुमार तिवारी से संपर्क करने का प्रयास किया गया। फोन की घंटी जाती रही, लेकिन कॉल रिसीव नहीं हुई। इसके बाद मोबाइल स्विच ऑफ बताया । अब ग्रामीणों की नजर प्रशासनिक जांच पर है। मांग की गई है कि खंड विकास अधिकारी भीटी पूरे प्रकरण की स्थलीय एवं अभिलेखीय जांच कराएं, दोनों पक्षों की वास्तविक स्थिति का सत्यापन हो और प्रधानमंत्री आवास योजना के निर्धारित नियमों के आधार पर पात्रता तय की जाए।
अब असली सवाल—छप्पर का हकदार कौन और ‘आवास’ का असली पात्र कौन?
फिलहाल मामला आरोपों और दावों के बीच खड़ा है। इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि होना बाकी है। जांच के बाद ही स्पष्ट होगा कि सीमा को योजना से बाहर करने का आधार सही था या नहीं और सुमन का नाम लाभार्थी सूची में नियमों के अनुरूप शामिल है या नहीं। अब देखना यह है कि जांच की फाइल खुलती है या फिर प्रधानमंत्री आवास योजना का यह ‘गजब गणित’ गांव की चर्चा बनकर रह जाता है।
What's Your Reaction?
Like
0
Dislike
0
Love
0
Funny
0
Angry
0
Sad
0
Wow
0