शिकायतों की जांच एवं ग्राम पंचायत निरीक्षण की फाइल खुली तो ‘वसूली इतिहास! डीपीआरओ पर गंभीर आरोप
शिकायतकर्ताओं का आरोप निरीक्षण से लेकर शिकायत निस्तारण तक चलता रहा कथित लेन-देन का खेल; खाते जांचे जाएं तो सामने आ सकता है बड़ा राज
अम्बेडकरनगर अचल वार्ता। पंचायती राज विभाग के जिला पंचायत राज अधिकारी (डीपीआरओ) उपेंद्र कुमार पांडेय को लेकर जिले में आरोप-प्रत्यारोप का दौर तेज है। शिकायतकर्ताओं और कुछ ग्राम प्रधानों की ओर से लगाए जा रहे आरोपों में विभागीय कार्यप्रणाली से लेकर कथित अवैध वसूली तक के गंभीर सवाल उठाए गए हैं। हालांकि, इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है और डीपीआरओ का पक्ष भी सामने आना बाकी है। ऐसे में आरोपों की असलियत जांच के बाद ही साफ हो सकेगी।शिकायतकर्ताओं का कहना है कि जब डीपीआरओ ने अंबेडकरनगर का कार्यभार संभाला तो भ्रष्टाचार पर कार्रवाई का भरोसा दिलाया गया था। लेकिन आरोप है कि कुछ समय बाद विभागीय निरीक्षणों और शिकायतों के निस्तारण को लेकर ही तरह-तरह की चर्चाएं शुरू हो गईं। आरोप लगाने वालों का कहना है कि अधिकारी द्वारा प्रतिदिन कई ग्राम सभाओं का निरीक्षण किया जाता था और निरीक्षण में मिली कमियों को लेकर ग्राम प्रधानों तथा ग्राम सचिवों पर दबाव बनाया जाता था।यहीं से शुरू होता है आरोपों का वह अध्याय, जिसमें शिकायतकर्ताओं के मुताबिक ‘निरीक्षण कम, हिसाब-किताब ज्यादा’ जैसी चर्चाएं सामने आईं। आरोप है कि ग्राम प्रधान और ग्राम सचिवों को बुलाकर कथित रूप से अवैध धन की मांग की जाती थी। जब यह मामला चर्चा में आया तो शिकायतकर्ताओं के अनुसार कथित ‘वसूली का स्थान’ भी बदल गया। अब आरोप है कि पंचायती राज विभाग में आने वाली शिकायतों से संबंधित ग्राम सचिवों को फाइल लेकर बुलाया जाता है और वहीं कथित तौर पर मामले को ‘सेट’ करने का प्रयास होता है। शिकायतकर्ताओं का यह भी दावा है कि इस कथित खेल में डीपीआरओ के करीबी बताए जाने वाले दो-तीन लोग भी सक्रिय रहते हैं और मामलों के निस्तारण में उनकी भूमिका रहती है। इन दावों की भी स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है।
डेढ़-दो लाख में मामला हल?’—आरोपों ने बढ़ाई हलचल
सबसे गंभीर आरोप यह लगाया जा रहा है कि कई मामलों में कथित तौर पर डेढ़ से दो लाख रुपये तक की रकम लेकर ग्राम प्रधान और ग्राम सचिवों को बचाने का प्रयास किया गया। आरोप लगाने वालों का दावा है कि कुछ शिकायतों का निस्तारण भी वास्तविक कार्रवाई के बजाय कागजी प्रक्रिया के जरिए किया गया और उच्च अधिकारियों को कथित रूप से भ्रमित किया जाता है।शिकायतकर्ताओं ने तो यहां तक दावा किया है कि यदि डीपीआरओ और उनके कथित करीबी लोगों के बैंक खातों की नियमानुसार जांच कराई जाए तो कथित लेन-देन से जुड़े महत्वपूर्ण तथ्य सामने आ सकते हैं। इसी क्रम में करीब 50 लाख रुपये की कथित वसूली का दावा भी किया गया है। यह आंकड़ा फिलहाल शिकायतकर्ता के आरोप का हिस्सा है, जिसकी स्वतंत्र अथवा आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।
प्रतापपुर चामूर्खा से हरैया-दो मामला, बेला परसा तक उठ रहे सवाल
शिकायतकर्ताओं ने ग्राम पंचायत प्रतापपुर चामूर्खा, ग्राम पंचायत हरैया-दो मामले , बेला परसा सहित कई मामलों में कथित रूप से लेन-देन कर शिकायतों को दबाने के आरोप लगाए हैं। इन मामलों की वास्तविक स्थिति क्या है, किस स्तर पर क्या कार्रवाई हुई और शिकायतों का निस्तारण नियमों के मुताबिक हुआ या नहीं—यह भी जांच का विषय है। प्रतापपुर चामूर्खा मामले को लेकर भी शिकायतकर्ता की ओर से अधिकारियों के कथित रूप से ‘मैनेज’ हो जाने संबंधी बात कहे जाने का दावा किया गया है। हालांकि, इस कथन की स्वतंत्र पुष्टि भी नहीं हुआ है।
ज्योतिष भी नहीं, जांच बताएगी साहब के गुण!’
आरोपों के बीच कुछ लोग अधिकारी के व्यक्तित्व और नाम के अक्षर से उनके गुण-दोष तक निकालने की कोशिश कर रहे हैं। लेकिन सरकारी अधिकारी के कामकाज का हिसाब चेहरे, राशि, नक्षत्र या नाम के पहले अक्षर से नहीं, बल्कि दस्तावेज, शिकायतों की जांच, आदेशों और वित्तीय रिकॉर्ड से ही तय हो सकता है। यानी यहां कुंडली नहीं, फाइल खुले तो ज्यादा अच्छा; और अगर बैंक रिकॉर्ड भी खुल जाए तो कहानी खुद-ब-खुद स्पष्ट हो सकती है।
अब प्रशासन की बारी—‘फाइल’ बोलेगी या फिर फाइल ही चुप रहेगी?
शिकायतकर्ताओं का सवाल है कि यदि आरोप निराधार हैं तो निष्पक्ष जांच कराकर स्थिति साफ क्यों न कर दी जाए? और यदि जांच में आरोपों की पुष्टि होती है तो जिम्मेदारी तय करने में देरी क्यों होते हैं नवागत मुख्य विकास अधिकारी और जिलाधिकारी से मांग की गई है कि पूरे मामले की उच्चस्तरीय एवं निष्पक्ष जांच कराई जाए। संबंधित शिकायतों की फाइलों, निस्तारण रिपोर्टों और विभागीय कार्रवाई की समीक्षा के साथ-साथ आवश्यकता होने पर नियमानुसार बैंक खातों और वित्तीय लेन-देन की भी जांच कराई जाए। फिलहाल पंचायती राज विभाग में सबसे बड़ा सवाल यही घूम रहा है—शिकायतों की फाइल अब कार्रवाई की मेज तक पहुंचेगी या फिर ‘निस्तारण’ की मुहर लगाकर कहानी खत्म कर दी जाएगी! आखिर जवाब जांच ही देगी। और अगर जांच निष्पक्ष हुई तो न राशि देखेगी, न रिश्ते, न सिफारिश.. सीधे रिकॉर्ड देखेगी और वही बताएगा कि ‘फाइल में क्या है’ और ‘फाइल के बाहर क्या चल रहा था’।
What's Your Reaction?
Like
0
Dislike
0
Love
0
Funny
0
Angry
0
Sad
0
Wow
0