सरकारी कुर्सी पर प्राइवेट 'मुंशीजी' का राज! डीपीआरओ उपेंद्र कुमार पांडेय की क्लीन चिट पर सीडीओ ने फेरा पानी, बोले— ऐसी लीपापोती नहीं चलेगी!
अम्बेडकरनगर अचल वार्ता/ अंबेडकर नगर के टांडा ब्लॉक में इन दिनों सरकारी दफ्तरों का जलवा कुछ अलग ही चल रहा है। यहाँ बाबू लोग अपनी कुर्सी पर कम, और अपने 'खास' प्राइवेट मुंशीजी पर ज्यादा भरोसा कर रहे हैं। मामला जब तूल पकड़ा तो प्रशासनिक गलियारों में हड़कंप मच गया है, और मुख्य विकास अधिकारी सीडीओ ने जिला पंचायत राज अधिकारी उपेंद्र कुमार पांडेय की उस 'जादूई जांच रिपोर्ट को सिरे से खारिज कर दिया है, जिसमें सब कुछ साफ़-सुथरा बता दिया गया था। क्या थी पूरी कहानी दरवेशपुर के रहने वाले वेद प्रकाश वर्मा ने सबूतों वीडियो के साथ शिकायत दर्ज कराई थी कि टांडा ब्लॉक के सचिव कार्यालय में नजारा किसी प्राइवेट थियेटर से कम नहीं है। वहाँ लाल शर्ट पहने बृजेश कुमार नाम का एक प्राइवेट मुंशी सीधे सचिव की गद्दी पर विराजमान था। महोदय सिर्फ बैठ ही नहीं रहे थे, बल्कि सरकारी मुहर और फर्जी दस्तखत के दम पर जन्म प्रमाण पत्र के सत्यापन के नाम पर 500 रुपये और विधवा/पारिवारिक लाभ पेंशन के नाम पर 200 रुपये की दक्षिणा वसूल रहे थे। हद तो तब हो गई जब मौके पर दो असली ग्राम पंचायत अधिकारी सूर्य प्रकाश गुप्ता और विवेक कुमार श्रीवास्तव भी मौजूद थे, लेकिन उन्होंने मुंशीजी को हटाने के बजाय शायद 'मूक दर्शक' बनने की ट्रेनिंग ले रखी थी।
डीपीआरओ उपेंद्र कुमार पांडेय साहब की अंधेर नगरी चौपट राजा वाली जांच
शिकायत के बाद मामला जिलाधिकारी तक पहुँचा। 23 सितंबर को डीएम ने सीडीओ को और 25 सितंबर को सीडीओ ने डीपीआरओ उपेंद्र कुमार पांडेय को जांच सौंपी। लेकिन डीपीआरओ उपेंद्र कुमार पांडेय साहब की जांच का निष्कर्ष ऐसा था कि अच्छे-अच्छे जासूस भी चकरा जाएं! 22 अक्टूबर को आई रिपोर्ट में फरमाया गया कि वीडियो एकदम अस्पष्ट है यानी मुंशीजी अदृश्य शक्ति या किसी एलियन की तरह कुर्सी पर बैठे थे! सचिवों की कोई गलती नहीं मिली।अतः मामला पूरी तरह निराधा' है। सीडीओ साहब का डंडा यह खेल यहाँ नहीं चलेगा! शुक्र है कि सीडीओ साहब की आँखें इस 'फर्जी क्लीन चिट' पर बंद नहीं हुईं। उन्होंने डीपीआरओ की इस लीपापोती वाली आख्या रिपोर्ट को तुरंत अस्वीकृत कर दिया।अब इस पूरी कहानी पर जनता और जानकारों के कुछ तीखे और मजाकिया सवाल खड़े हो रहे हैं। वीडियो का मायाजाल डीपीआरओ उपेंद्र कुमार पांडेय साहब को वीडियो में मुंशीजी की शक्ल क्यों नहीं दिखी? क्या वे चश्मे का नंबर बदलवाना भूल गए थे या मामला ही कुछ और था कुर्सी का वीआईपी पास क्या सरकारी नियमों में ऐसा कोई प्रावधान है कि कोई भी अठन्नी-चवन्नी उठकर सरकारी कुर्सी पर बैठ जाए और दफ्तर को अपना प्राइवेट खानदानी बिजनेस समझ ले मूकदर्शक अधिकारियों का मौन व्रत मौके पर मौजूद दोनों अधिकारी क्या वहाँ केवल मुंशीजी की आरती उतारने के लिए खड़े थे? उनसे लिखित जवाब मांगने की जहमत क्यों नहीं उठाई गई? अब आगे क्या नियम यह कहता है कि सरकारी मुहर और दस्तावेजों का इस्तेमाल सिर्फ और सिर्फ अधिकृत अधिकारी ही कर सकते हैं। प्राइवेट व्यक्ति का कुर्सी पर कब्जा जमाना सीधे तौर पर भ्रष्टाचार और कानून का मखौल उड़ाना है। सीडीओ द्वारा रिपोर्ट खारिज किए जाने के बाद अब इस पूरे मामले की दोबारा और निष्पक्ष जांच तय मानी जा रही है। अब देखना दिलचस्प होगा कि इस री-टेक रिपोर्ट वाली जांच में मुंशीजी, संबंधित सचिवों और 'मूकदर्शक' अधिकारियों पर गाज गिरती है या वे फिर से कोई नया फॉर्मूला ढूंढ निकालते हैं!
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