संविधान में बराबरी, ज़मीनी हकीकत में भेदभाव: पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों के अधिकार खोखले साबित
पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों पर भेदभाव, सिख समुदाय पर हमले, जबरन धर्म परिवर्तन, ईशनिंदा कानूनों का दुरुपयोग और न्यायिक विफलताओं पर रिपोर्ट का बड़ा खुलासा।
इस्लामाबाद | अचल वार्ता
पाकिस्तान का संविधान भले ही धार्मिक अल्पसंख्यकों को समान अधिकार और सुरक्षा की गारंटी देता हो, लेकिन ज़मीनी सच्चाई बार-बार इन दावों को झुठलाती नजर आती है। हाल ही में सामने आई एक विस्तृत रिपोर्ट ने पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों के खिलाफ व्यवस्थागत भेदभाव, प्रशासनिक उदासीनता और न्यायिक विफलताओं को उजागर किया है।
रिपोर्ट के अनुसार, अल्पसंख्यकों की स्थिति में सुधार केवल राजनीतिक भाषणों या कागजी वादों से संभव नहीं है। इसके लिए स्वतंत्र जांच, अदालतों के आदेशों का त्वरित पालन, दोषी अधिकारियों की जवाबदेही और ईशनिंदा कानूनों व भीड़ हिंसा के दुरुपयोग पर सख्त रोक जरूरी है। न्याय व्यवस्था और प्रशासनिक ढांचा बार-बार अल्पसंख्यकों की रक्षा करने में नाकाम साबित हो रहा है, जिससे समुदायों में भय और असुरक्षा लगातार बढ़ रही है।
सिख कारोबारी गुरविंदर सिंह का मामला बना उदाहरण
रिपोर्ट में पेशावर के सिख कारोबारी गुरविंदर सिंह का मामला प्रमुखता से उठाया गया है, जो पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों के प्रति प्रणालीगत पक्षपात की तस्वीर पेश करता है। गुरविंदर सिंह के अनुसार, 2022-23 के बीच उनके तीन मुस्लिम साझेदारों ने उनसे करीब 7.5 करोड़ पाकिस्तानी रुपये की धोखाधड़ी की।
गबन सामने आने के बाद सिंह ने पुलिस में एफआईआर दर्ज कराई, लेकिन आज तक उन्हें न्याय नहीं मिला। आरोपियों ने बाउंस चेक दिए, स्टांप पेपर पर लिखित आश्वासन भी दिए, इसके बावजूद कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। ट्रायल कोर्ट, सेशंस कोर्ट और यहां तक कि पेशावर हाईकोर्ट से उनके पक्ष में फैसले आने के बावजूद आरोपी खुलेआम घूम रहे हैं।
गुरविंदर सिंह ने अपनी शिकायत प्रांतीय सरकार, संघीय सरकार और यहां तक कि सेना प्रमुख तक पहुंचाई, लेकिन कहीं से कोई हस्तक्षेप नहीं हुआ। सिंह का कहना है कि यह उदासीनता सिर्फ इसलिए है क्योंकि वे सिख अल्पसंख्यक हैं।
सिख महिलाओं पर जबरन धर्म परिवर्तन और विवाह का खतरा
रिपोर्ट में सिख महिलाओं की स्थिति को लेकर भी गंभीर चिंता जताई गई है। अपहरण, जबरन धर्म परिवर्तन और जबरन विवाह जैसे मामलों में लगातार बढ़ोतरी हो रही है।
2019 में ननकाना साहिब की जगजीत कौर का मामला इसका बड़ा उदाहरण है, जिन्हें बंदूक की नोक पर अगवा कर जबरन इस्लाम कबूल करवाया गया। हैरानी की बात यह रही कि न्यायपालिका ने भी पीड़िता के बजाय अपहरणकर्ता के पक्ष में झुकाव दिखाया।
लक्षित हत्याएं और भीड़ हिंसा
धार्मिक पहचान के कारण सिख पुरुषों को भी मौखिक, शारीरिक उत्पीड़न और लक्षित हत्याओं का सामना करना पड़ रहा है।
2023 में पेशावर में दयाल सिंह और मनमोहन सिंह जैसे सिख दुकानदारों की हत्या ने पूरे समुदाय को झकझोर दिया था।
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि ईशनिंदा के झूठे आरोप और भीड़ की हिंसा का इस्तेमाल अक्सर अल्पसंख्यकों की जमीन और संपत्ति पर कब्जा करने के लिए किया जाता है।
धार्मिक स्थलों पर हमले
गुरुद्वारों और अन्य अल्पसंख्यक धार्मिक स्थलों पर हमले और तोड़फोड़ की घटनाएं भी आम होती जा रही हैं।
2020 में ननकाना साहिब स्थित गुरुद्वारा जन्मस्थान पर भीड़ द्वारा किया गया हमला इस बात का प्रमाण है कि कैसे मामूली विवादों को सांप्रदायिक रंग देकर आस्था केंद्रों को निशाना बनाया जाता है।
संवैधानिक वादे बनकर रह गए खोखले दावे
रिपोर्ट का निष्कर्ष साफ है—जब तक पाकिस्तान अपनी कानूनी और प्रशासनिक व्यवस्था में व्याप्त पूर्वाग्रहों को दूर नहीं करता, तब तक अल्पसंख्यकों को दिए गए संवैधानिक वादे सिर्फ कागजों तक सीमित रहेंगे।
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