मंदिर में शादी, बेटे का जन्म भी नहीं बना बचाव! 13 साल की किशोरी से संबंध के नौ साल पुराने मामले में पति को 10 साल की सजा

Oct 8, 2026 - 10:37
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मंदिर में शादी, बेटे का जन्म भी नहीं बना बचाव! 13 साल की किशोरी से संबंध के नौ साल पुराने मामले में पति को 10 साल की सजा

हरदोई (अचलवार्ता)। प्रेम संबंध था, मंदिर में शादी का दावा था और बाद में एक बेटे का जन्म भी हुआ। दोनों लंबे समय तक पति-पत्नी की तरह साथ भी रहे, लेकिन नौ साल पुराने इस मामले में ये तमाम दलीलें अदालत में आरोपी के लिए कानूनी बचाव नहीं बन सकीं। बेनीगंज क्षेत्र के वर्ष 2017 के पॉक्सो मामले में विशेष न्यायाधीश (पॉक्सो एक्ट कोर्ट नंबर-14) ने आरोपी सुनील को दोषी ठहराते हुए 10 वर्ष के कारावास और 50 हजार रुपये के अर्थदंड की सजा सुनाई।

मामले की शुरुआत 29 मई 2017 को हुई थी। पीड़िता की मां ने बेनीगंज कोतवाली में तहरीर देकर बताया था कि उसकी 13 वर्षीय बेटी घर से लापता हो गई है। काफी तलाश के बाद भी जब उसका कोई पता नहीं चला तो पुलिस ने रिपोर्ट दर्ज कर उसकी तलाश शुरू की। विवेचना आगे बढ़ी तो पता चला कि गांव का युवक चंडीगढ़ में रह रहा था और किशोरी उसके पास चली गई थी। पुलिस ने उसे चंडीगढ़ से बरामद किया। मेडिकल परीक्षण में किशोरी के गर्भवती होने की पुष्टि हुई।

मामला अदालत पहुंचा तो किशोरी ने अपने बयान में युवक के साथ प्रेम संबंध होने और अपनी इच्छा से उसके पास जाने की बात कही। उसने मंसादेवी मंदिर में शादी करने की बात भी बताई। इसके बाद उसने एक बेटे को जन्म दिया। समय बीतता गया और दोनों साथ रहते रहे। सुनवाई के दौरान आरोपी पक्ष ने इसी परिस्थितियों को आधार बनाते हुए दलील दी कि दोनों के बीच संबंध सहमति से बने थे और वे लंबे समय से पति-पत्नी की तरह रह रहे हैं। पीड़िता की मां ने भी दोनों के साथ रहने की बात अदालत में कही।

लेकिन इस मामले में अदालत के सामने सबसे निर्णायक तथ्य घटना के समय किशोरी की उम्र थी। पॉक्सो कानून में नाबालिग की सहमति को वैध कानूनी सहमति नहीं माना जाता। लिहाजा प्रेम संबंध, मंदिर में शादी अथवा बाद में पति-पत्नी की तरह साथ रहना आरोपी के लिए उस घटना का कानूनी बचाव नहीं बन सका।

सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष ने आठ गवाह और 11 अभिलेखीय साक्ष्य न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत किए। उपलब्ध साक्ष्यों और संबंधित कानूनी प्रावधानों के परीक्षण के बाद अदालत ने आरोपी को दोषी माना और उसे 10 वर्ष के कठोर कारावास के साथ 50 हजार रुपये के अर्थदंड से दंडित किया।

हरदोई पुलिस के आधिकारिक प्रेस-नोट के अनुसार मामला मु0अ0सं0 135/17 से संबंधित है, जिसमें धारा 366, 363, 370, 376 आईपीसी तथा ¾ और 16/17 पॉक्सो एक्ट के तहत कार्रवाई की गई थी। दोषी ठहराया गया अभियुक्त सुनील पुत्र केदार, निवासी कुतुआपुर, थाना कासिमपुर, जनपद हरदोई है। न्यायालय ने 6 अक्टूबर 2026 को सजा सुनाई।

पुलिस के मुताबिक यह कार्रवाई “ऑपरेशन कन्विक्शन” अभियान के तहत गुणवत्तापूर्ण विवेचना और प्रभावी अभियोजन पैरवी का परिणाम है। अभियोजन अधिकारी अमित कुमार शुक्ल, विवेचक उपनिरीक्षक इरशाद अली और पैरोकारी में कांस्टेबल अंकित सैनी के योगदान का भी पुलिस ने उल्लेख किया है।

इस फैसले ने एक बार फिर यह कानूनी स्थिति सामने रखी कि घटना के समय पीड़ित नाबालिग हो तो उसकी सहमति को पॉक्सो कानून के तहत वैध सहमति नहीं माना जाता। बाद की शादी, साथ रहना या पारिवारिक परिस्थितियां उस समय किए गए अपराध की कानूनी स्थिति को नहीं बदलतीं।

हरदोई से लक्ष्मीकान्त पाठक की रिपोर्ट

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