विश्व अस्थमा दिवस विशेष : “साइलेंट इन्फ्लेमेशन” एक वास्तविक समस्या है

May 10, 2026 - 12:24
May 10, 2026 - 12:27
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विश्व अस्थमा दिवस विशेष : “साइलेंट इन्फ्लेमेशन” एक वास्तविक समस्या है
विश्व अस्थमा दिवस विशेष : “साइलेंट इन्फ्लेमेशन” एक वास्तविक समस्या है

देहरादून, अचल वार्ता। विश्व अस्थमा दिवस के उपलक्ष्य में अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान, ऋषिकेश के विशेषज्ञों ने इस बीमारी के विभिन्न पहलुओं पर अपनी राय साझा की है। उनका मानना है कि, जहां एक ओर लाखों सामान्य लोगों जिन्हें सांस लेने में कभी भी किसी तरह की कोई परेशानी, हिचकिचाहट नहीं होती, के लिए विश्व अस्थमा दिवस का कोई खास महत्व नहीं है, वहीं दूसरी ओर अस्थमा से पीड़ित 3.4 करोड़ भारतीयों के लिए, यह दिवस एक याद दिलाता है कि सांस लेने जैसी बुनियादी चीज़ भी अभी तक सुनिश्चित नहीं है।

  संस्थान की कार्यकारी निदेशक, सीईओ व देश की जानी मानी पीडियाट्रिक्स पल्मोनोलॉजिस्ट प्रोफेसर डॉ. मीनू सिंह ने बताया कि ग्लोबल इनिशिएटिव फॉर अस्थमा (GINA), जो इस वार्षिक आयोजन को विश्वस्तर पर आयोजित करता है, ने इस वर्ष इस दिवस को मनाने के लिए एक ऐसा विषय (थीम) चुना है जो नारे से ज़्यादा एक अभियोग जैसा लगता है: “अस्थमा से पीड़ित हर व्यक्ति के लिए सूजनरोधी इनहेलर की पहुंच, अभी भी एक अत्यावश्यक आवश्यकता है।”

  विशेषज्ञों का मानना है कि भारत के अधिकांश घरों में, जहां किसी को अस्थमा है, आपको कहीं न कहीं एक नीला इनहेलर मिल जाएगा। किसी बैग में, बिस्तर के पास रखी मेज पर या स्कूल बैग में। लेकिन आपको भूरा या बैंगनी रंग का इनहेलर बहुत कम दिखाई पड़ेगा। कंट्रोलर इनहेलर, यह इनहेलर जो वास्तव में दिन-प्रतिदिन इस बीमारी को नियंत्रण में रखता है।

  निदेशक एम्स व विषय विशेषज्ञ प्रो. मीनू सिंह का मानना है कि समस्या की जड़ यहीं है। भारत में निदान किए गए अस्थमा रोगियों में से 10 प्रतिशत से भी कम इनहेल्ड कॉर्टिकोस्टेरॉइड (ICS) उपचार प्राप्त कर रहे हैं, जिसे दिशानिर्देश दीर्घकालिक नियंत्रण के लिए अनुशंसित करते हैं। नीला रिलीवर इनहेलर, अस्थमा का दौरा पड़ने पर वायुमार्ग की मांसपेशियों को शिथिल करता है। यह अग्निशामक यंत्र की तरह है। लेकिन कंट्रोलर इनहेलर सूजन और बलगम के जमाव का इलाज करता है, जो अस्थमा के दौरे का कारण बनता है। एक विशेषज्ञ चिकित्सक के शब्दों में, केवल रिलीवर इनहेलर पर निर्भर रहना आग के जलते रहने के दौरान धुएं का इलाज करने जैसा है। लिहाजा, मरीज अक्सर बेहतर महसूस करते ही अपना कंट्रोलर इनहेलर बंद कर देते हैं। यह एक स्वाभाविक प्रवृत्ति है। यूं भी जब आप स्वयं को ठीक महसूस कर रहे हों तो दवा क्यों लें? लेकिन अस्थमा हमेशा हमला करने से पहले खुद को प्रकट नहीं करता।
उन्होंने बताया कि “साइलेंट इन्फ्लेमेशन” एक वास्तविक समस्या है, और अचानक गंभीर दौरा कई हफ्तों तक पूरी तरह से सामान्य महसूस करने के बाद आ सकता है।

  विशेषज्ञों का मानना है कि जिन मरीजों के पास सही दवा होती है, उनके लिए भी इसे फेफड़ों तक पहुंचाना जितना आसान लगता है, उससे कहीं ज्यादा मुश्किल है। अध्ययनों से पता चलता है कि लगभग 70% से 90% मरीज अपने इनहेलर का सही तरीके से इस्तेमाल नहीं कर रहे हैं, वह सांस लेने से पहले पूरी तरह से सांस छोड़ना भूल जाते हैं, सांस लेने के बाद सांस नहीं रोकते और प्रक्रिया को जल्दबाजी में पूरा करते हैं। इसका नतीजा यह होता है कि दवा गले के पिछले हिस्से में ही रह जाती है, बजाए इसके कि वह फेफड़ों के ऊतकों तक पहुंचे, जहां इसकी जरूरत होती है।

 निदेशक एम्स प्रोफेसर डॉ. मीनू सिंह ने बताया कि विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों में, प्रशिक्षित स्वास्थ्यकर्मियों की सीमित उपलब्धता के कारण यह समस्या और भी बढ़ जाती है, जो उचित तकनीक का प्रदर्शन कर सकें।  बढ़ते वायु प्रदूषण के स्तर के साथ वाहनों के धुएं से निकलने वाला PM2.5 और कई घरों में अभी भी आम बायोमास खाना पकाने के ईंधन से निकलने वाला धुआं आदि मामलों से इस समस्या को सही ढंग से हल करने का महत्व और भी अधिक बढ़ जाता है।

 2026 के ग्लोबल इनिशिएटिव फॉर अस्थमा (GINA) द्वारा जारी दिशा-निर्देश स्पष्ट रूप से कहते हैं कि, लगभग सभी अस्थमा रोगियों, जिनमें प्री-स्कूल के बच्चे भी शामिल हैं, के लिए इनहेल्ड कॉर्टिकोस्टेरॉइड्स आवश्यक हैं। यह केवल गंभीर मामलों के लिए सिफारिश नहीं है। यह बुनियादी देखभाल का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। 

 एम्स,ऋषिकेश की पीडियट्रिक्स पल्मोनरी एसआर डॉ. खुशबू तनेजा ने बताया कि अस्थमा की बीमारी में किसी के जीवन को परिभाषित नहीं करना चाहिए। लेकिन भारत में अभी, बहुत से लोगों के लिए, यह ऐसा ही है, जो कि सिर्फ इसलिए नहीं कि उपचार मौजूद नहीं हैं, बल्कि इसलिए कि दवा जो कर सकती है और रोगियों को वास्तव में जो मिल रहा है, उसके बीच का अंतर बहुत बड़ा बना हुआ है। लिहाजा विश्व अस्थमा दिवस के आयोजन का असली उद्देश्य इसी अंतर को पाटना है। जिस पर गंभीरतापूर्वक गौर किए जाने की नितांत आवश्यकता है।

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