महाभारत का अभिमन्यु या व्यवस्था का अधिकारी? चक्रव्यूह तब भी था, चक्रव्यूह आज भी है...
महाभारत का वह दृश्य आज भी भारतीय मानस को विचलित कर देता है, जब एक युवा योद्धा—अभिमन्यु—अकेला चक्रव्यूह में प्रवेश करता है। उसे पता था कि भीतर जाना आता है, लौटने का मार्ग नहीं। फिर भी उसने कर्तव्य से मुँह नहीं मोड़ा। वह एक-एक कर महारथियों का सामना करता रहा। अंततः जब युद्ध के नियम टूटे, अनेक योद्धाओं ने एक साथ उस पर प्रहार किया और अभिमन्यु रणभूमि में गिर पड़ा। उसकी मृत्यु केवल एक वीर की मृत्यु नहीं थी, बल्कि यह प्रश्न भी छोड़ गई कि जब व्यवस्था के नियम टूट जाते हैं, तब सबसे पहले आहत न्याय ही होता है।
युग बदल गए। राजसत्ताएँ लोकतंत्र में बदल गईं। युद्धभूमि अब कुरुक्षेत्र नहीं रही, किंतु चक्रव्यूह आज भी जीवित है। बस उसके स्वरूप बदल गए हैं। अब तीरों की जगह आरोप चलते हैं, गदाओं की जगह राजनीतिक दबाव, तलवारों की जगह सामाजिक ध्रुवीकरण और रणभेरी की जगह मीडिया तथा जनमत का शोर सुनाई देता है। इस आधुनिक चक्रव्यूह में कई बार कोई प्रशासनिक अधिकारी स्वयं को अकेला खड़ा पाता है।
शाहाबाद के उपजिलाधिकारी सुशील कुमार मिश्रा का नाम भी पिछले कुछ समय से लगातार विवादों के केंद्र में रहा है। परियल प्रकरण में वे स्वयं हिंसा का शिकार हुए और रक्तरंजित अवस्था तक पहुँच गए। उस घटना की स्मृतियाँ धुंधली भी नहीं हुई थीं कितब तक एक दलित महिला लेखपाल द्वारा लगाए गए गंभीर आरोपों ने उन्हें फिर सार्वजनिक बहस के केंद्र में ला खड़ा किया है। दूसरी ओर उपजिलाधिकारी इन सभी आरोपों को निराधार बताते हैं। मामला जांचाधीन है और अंतिम सत्य अभी सामने आना शेष है। इसलिए किसी भी पक्ष पर अंतिम निर्णय देना न्याय की भावना के अनुरूप नहीं होगा।फिर भी घटनाओं का यह सिलसिला अनेक प्रश्न छोड़ जाता है। क्या यह केवल संयोग है कि एक ही अधिकारी बार-बार विवादों के घेरे में आ रहा है? या फिर यह उस प्रशासनिक व्यवस्था का यथार्थ है, जहाँ कर्तव्य निभाने वाला अधिकारी हर निर्णय के साथ एक नया विरोध भी अर्जित कर लेता है? क्या आज का प्रशासनिक तंत्र ऐसे चक्रव्यूह में प्रवेश कर चुका है, जहाँ हर दिशा में आरोप, प्रत्यारोप और दबाव खड़े दिखाई देते हैं?
लोकतंत्र का सबसे बड़ा सौंदर्य यही है कि यहाँ न कोई पद कानून से ऊपर है और न कोई आरोप कानून से बड़ा। यदि किसी अधिकारी ने अपने अधिकारों का दुरुपयोग किया है, तो उसे दंडित होना ही चाहिए। लेकिन यदि आरोप असत्य सिद्ध होते हैं, तो उसकी प्रतिष्ठा की रक्षा भी उतनी ही दृढ़ता से होनी चाहिए। न्याय का धर्म दोनों स्थितियों में समान रहता है।
सबसे बड़ा प्रश्न यही है—क्या आधुनिक व्यवस्था का यह अभिमन्यु भी आरोपों और विवादों के चक्रव्यूह में पराजित हो जाएगा, या इस बार चक्रव्यूह टूटेगा और न्याय विजयी होगा?
इस प्रश्न का उत्तर न सोशल मीडिया दे सकता है, न राजनीतिक बयान और न ही जनभावनाएँ। इसका उत्तर केवल निष्पक्ष जांच, साक्ष्य और कानून देंगे।
महाभारत में अभिमन्यु चक्रव्यूह से जीवित बाहर नहीं निकल सका था। किंतु लोकतंत्र की सफलता इसी में है कि यहाँ किसी भी व्यक्ति का भाग्य भीड़ नहीं, बल्कि न्याय तय करे। यदि व्यवस्था निष्पक्ष है, तो आधुनिक चक्रव्यूह का अंत किसी अभिमन्यु की मृत्यु से नहीं, बल्कि सत्य की विजय से होना चाहिए।
क्योंकि इतिहास का सबसे बड़ा प्रश्न यह नहीं होता कि चक्रव्यूह कितना मजबूत था; इतिहास अंततः यह याद रखता है कि उसके भीतर धर्म, न्याय था या नही।
- लक्ष्मीकांत पाठक
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