सारंगपुर में जांच की जादूगरी, फाइलें सरपट दौड़ीं, ज़मीन पर विकास ने फिर आँखें मूंद लीं!
अम्बेडकरनगर अचल वार्ता/विकास खंड कटेहरी से भ्रष्टाचार के निवारण की एक ऐसी अद्भुत और चमत्कारी कहानी सामने आई है, जिसे पढ़कर घूस की सफेद चादर ओढ़ लिया ग्रामीणों आरोप शिकायत के सभी जांचों भ्रष्ट सचिव प्रधान को बचाया जाता है कागजों पर विकास ऐसे पंख लगाकर उड़ता है कि फाइलें देखकर लगता है मानो पूरा स्वीडन कटेहरी में ही उतर आया हो, बस फर्क इतना है कि ज़मीन पर झांकने पर केवल धूल ही उड़ती दिखती है।प्रतापपुर चमुर्खा गांव में विकास कार्यों की जांच के लिए शासन ने तीन धुरंधर 'जांच-ब्रह्मास्त्रों' की एक विशेष टीम उतारी— सहायक विकास अधिकारी (ग्राम विकास) अनिल कुमार सिंह, ग्रामीण अभियंत्रण विभाग के अवर अभियंता अतुल मौर्य, और लघु सिंचाई विभाग के अवर अभियंता रामजीत! इन 'कल-युगी' जांच अधिकारियों ने अपनी जादुई दृष्टि से ऐसा कमाल दिखाया कि दूध के धुले प्रधान और ग्राम सचिव मांडवी उपाध्याय जिनका पिछला इतिहास और वर्तमान इतिहास भी किसी थ्रिलर फिल्म से कम नहीं है। की जय-जयकार हो गई। आइए, इस जादुई जांच के कुछ अनमोल और हैरान कर देने वाले पन्नों पर एक नजर डालते हैं। इंटरलॉकिंग के दो भुगतान—जादूई सड़क या डबल रोल! पहला करिश्मा: सामुदायिक शौचालय से उमापति के घर तक इंटरलॉकिंग पर ₹1 लाख 88हजार 500 स्वाहा। दूसरा करिश्मा: रोशनलाल के घर से सामुदायिक शौचालय तक इंटरलॉकिंग पर ₹57 हजार489 का वारा-न्यारा। जांच का निष्कर्ष: दोनों काम बिल्कुल अलग-अलग जगहों पर हुए और एकदम परफेक्ट पाए गए! हमारा सवाल: जब फाइलें ही इतनी मजबूत थीं, तो जमीन पर फटकने की क्या जरूरत? वैसे भी, फाइल की सड़क पर चलना आसान होता है, असली सड़क पर तो गाड़ियां ही फिसलती हैं! ई-रिक्शा की मरम्मत—बिल ₹66,300 का भुगतान ₹64,000 का! मामला: पंचायत के ई-रिक्शा लोडर की मरम्मत का। जांच का गणित: स्टेटमेंट में लागत ₹66,300 दर्शाई गई, लेकिन भुगतान 64 हजार हुआ। टीम ने वाहन का 'स्थलीय सत्यापन' भी कर लिया। हमारा सवाल: यह ₹2 हजार 300 का जो गणितीय गोलमोल है। क्या यह किसी जादुई डिस्काउंट का हिस्सा था या फिर हिसाब की डायरी में कोई नया फॉर्मूला ईजाद हुआ है। जनता जानना चाहती है कि इस बचत की बरकत किसके घर पहुंची! मिट्टी पटाई में भी 'डिजिटल डिस्काउंट'! मामला: भीमसेन के घर के सामने मिट्टी पटाई का। जांच का कमाल: स्टेटमेंट बना ₹19,931 का, और भुगतान हुआ ₹19,500 का! हमारा सवाल: वाह रे ईमानदारी! चार सौ 31 का यह भारी-भरकम अंतर देखकर तो सीए (CA) लोग भी अपने माथे पर हाथ रख लेंगे। कहीं यह वही बचत तो नहीं जिससे देश की अर्थव्यवस्था चल रही है।होलिका दहन से हनुमान मंदिर तक—'आधा भुगतान, अधूरा अरमान मामला: ₹1,65,000 का भुगतान, जबकि स्टेटमेंट ठोक-पीटकर ₹3,69,692 का बनाया गया था। जांच का तर्क: सचिव जी का बयान है कि खाते में कंगाली थी, इसलिए बाकी पैसे नहीं दिए; जब लक्ष्मी जी बरसेंगी, तब भुगतान होगा।
हमारा सवाल: यानी काम का ट्रेलर रिलीज हो चुका है, पिक्चर बजट आने पर रिलीज होगी! तब तक जनता हनुमान मंदिर के रास्ते पर भक्ति भाव से गड्ढों को निहारती रहे।
सबसे मजेदार सवाल--- शिकायतकर्ता संतुष्ट, पर अधिकारी नाखुश! इस पूरी जांच का कहानी सबसे बेहतरीन है। एक तरफ रिपोर्ट कहती है कि शिकायतकर्ता फोन पर ही 'पूरी तरह संतुष्ट' हो गया और दूध की तरह साफ-सुथरा महसूस करने लगा। वहीं दूसरी तरफ, समीक्षा करने वाले उच्च अधिकारी ने टिप्पणी ठोक दी कि निस्तारण की गुणवत्ता से हम संतुष्ट नहीं हैं, इसमें सुधार करो! यानी जांच करने वाले अपनी पीठ थपथपा रहे हैं, शिकायतकर्ता हवा में संतुष्ट हो चुका है, लेकिन ऊपर बैठा साहब कह रहा है— अरे भाई, थोड़ा ढंग का पर्दा डालो, भ्रष्टाचार अभी थोड़ा-थोड़ा बाहर झांक रहा है! कटेहरी की इस जांच ने साबित कर दिया है कि कागजों पर विकास करना और जमीन पर उसे उतारना दो अलग-अलग दुनियाएं हैं। जब तक फाइल का हिसाब और जमीन का विकास आमने-सामने खड़े होकर एक-दूसरे को नहीं देखेंगे, तब तक जनता यूं ही इन जांच अधिकारियों के जादुई करिश्मे पर ताली बजाती रहेगी! क्या आपके इलाके में भी ऐसे ही कागजी जादूगर एक्टिव हैं या वहां सचमुच सड़क पर पत्थर दिखते हैं?
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