भारत छोड़ो आंदोलन के 84 साल: पटना सचिवालय पर सात छात्रों का बलिदान, जेपी के ‘आजाद दस्ते’ ने अंग्रेजों की नींव हिलाई
भारत छोड़ो आंदोलन 1942 में बिहार की भूमिका बेहद अहम रही। पटना सचिवालय पर सात छात्रों का बलिदान और जयप्रकाश नारायण के आजाद दस्ते की पूरी कहानी जानिए।
पटना, अचल वार्ता। भारत छोड़ो आंदोलन यानी Quit India Movement भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का वह निर्णायक अध्याय था, जिसने अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ देशभर में जनआंदोलन का रूप ले लिया।
8 अगस्त 1942 को महात्मा गांधी के ‘करो या मरो’ के आह्वान के बाद शुरू हुए इस आंदोलन में बिहार की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण रही। छात्रों, युवाओं, किसानों और महिलाओं ने अंग्रेजी शासन के खिलाफ मोर्चा संभाला।
बिहार में पटना सचिवालय पर तिरंगा फहराने के प्रयास में सात छात्रों का बलिदान, जयप्रकाश नारायण का हजारीबाग जेल से निकलकर भूमिगत आंदोलन को गति देना और ‘आजाद दस्ता’ का गठन इस संघर्ष के महत्वपूर्ण अध्याय रहे। बड़े नेताओं की गिरफ्तारी के बाद भी आंदोलन की आग बुझी नहीं, बल्कि आम जनता ने खुद इसकी कमान संभाल ली।
8 अगस्त 1942 को हुआ भारत छोड़ो आंदोलन का आह्वान
8 अगस्त 1942 को मुंबई के ग्वालिया टैंक मैदान में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने अंग्रेजों के खिलाफ निर्णायक आंदोलन का आह्वान किया। महात्मा गांधी ने देशवासियों को ‘करो या मरो’ का मंत्र दिया।
अगले ही दिन अंग्रेजी सरकार ने गांधीजी सहित कांग्रेस के कई बड़े नेताओं को गिरफ्तार कर लिया। नेतृत्व को जेल में डालने के बावजूद आंदोलन थमा नहीं। देश के अलग-अलग हिस्सों में युवाओं और आम जनता ने आंदोलन की कमान अपने हाथों में ले ली। बिहार भी इस जनआंदोलन में पूरी ताकत के साथ शामिल हुआ।
11 अगस्त 1942: पटना सचिवालय के सामने छात्रों का बलिदान
भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान 11 अगस्त 1942 बिहार के इतिहास में अमर हो गया। पटना में छात्रों ने अंग्रेजी शासन के खिलाफ प्रदर्शन किया और सचिवालय पर तिरंगा फहराने के लिए आगे बढ़े।
आंदोलनकारियों का लक्ष्य अंग्रेजी हुकूमत के प्रतीक यूनियन जैक को हटाकर वहां तिरंगा फहराना था। प्रदर्शन के दौरान पुलिस ने छात्रों पर गोली चला दी।
गोलीबारी के बावजूद छात्रों का हौसला नहीं टूटा। वे तिरंगा लेकर आगे बढ़ते रहे। इस संघर्ष में सात छात्र शहीद हो गए। उनके बलिदान ने बिहार में भारत छोड़ो आंदोलन को और व्यापक बना दिया।
पटना सचिवालय के पास आज भी इन सात शहीदों की स्मृति में स्मारक मौजूद है।
कौन थे पटना सचिवालय के सात शहीद?
पटना सचिवालय गोलीकांड में शहीद हुए सात छात्रों के नाम इस प्रकार हैं—
- उमाकांत प्रसाद सिंह
- रामानंद सिंह
- सतीश प्रसाद झा
- जगपति कुमार
- देवीपद चौधरी
- राजेंद्र सिंह
- राम गोविंद सिंह
इन छात्रों के बलिदान ने स्वतंत्रता आंदोलन में बिहार के युवाओं की भूमिका को इतिहास में अमर कर दिया।
हजारीबाग जेल से निकले जयप्रकाश नारायण, संभाली भूमिगत आंदोलन की कमान
भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान समाजवादी नेता जयप्रकाश नारायण (जेपी) को हजारीबाग सेंट्रल जेल में बंद किया गया था। 9 नवंबर 1942 को दीपावली के अवसर पर वह जेल से फरार होने में सफल रहे।
जेल से निकलने के बाद जेपी भूमिगत आंदोलन में सक्रिय हो गए। उन्होंने नेपाल की तराई में जाकर अंग्रेजी शासन के खिलाफ भूमिगत गतिविधियों को संगठित किया और ‘आजाद दस्ता’ के गठन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
आजाद दस्ते का उद्देश्य अंग्रेजी शासन के खिलाफ भूमिगत प्रतिरोध को मजबूत करना था। जेपी की सक्रियता ने बिहार और आसपास के क्षेत्रों में आंदोलन को नई ऊर्जा दी।
किसानों ने भी संभाला मोर्चा
भारत छोड़ो आंदोलन केवल शहरों और छात्रों तक सीमित नहीं रहा। बिहार के ग्रामीण इलाकों में किसानों ने भी आंदोलन को मजबूत किया।
किसान सभाओं और स्थानीय संगठनों के प्रभाव से बड़ी संख्या में किसान अंग्रेजी शासन के विरोध में सामने आए। कई जगहों पर सरकारी संस्थानों के बहिष्कार और अंग्रेजी प्रशासन के खिलाफ प्रदर्शन हुए। इससे आंदोलन को ग्रामीण क्षेत्रों तक पहुंचाने में मदद मिली।
महिलाओं ने भी निभाई महत्वपूर्ण भूमिका
बिहार की महिलाओं ने भी भारत छोड़ो आंदोलन में सक्रिय भागीदारी निभाई। महिलाओं ने जुलूसों और सभाओं में हिस्सा लिया तथा कई स्थानों पर आंदोलन का नेतृत्व भी किया।
उस दौर में महिलाओं का सार्वजनिक आंदोलनों में बड़ी संख्या में सामने आना अपने आप में महत्वपूर्ण सामाजिक बदलाव था। महिलाओं ने अंग्रेजी शासन के खिलाफ जनजागरण में अहम भूमिका निभाई।
बड़े नेताओं की गिरफ्तारी के बाद जनता बनी आंदोलन की ताकत
भारत छोड़ो आंदोलन शुरू होते ही अंग्रेजी सरकार ने बिहार के कई प्रमुख नेताओं को गिरफ्तार कर लिया। डॉ. राजेंद्र प्रसाद और श्रीकृष्ण सिंह जैसे प्रमुख नेताओं को भी गिरफ्तार कर बांकीपुर जेल में रखा गया।
लेकिन नेताओं की गिरफ्तारी का आंदोलन पर अपेक्षित असर नहीं पड़ा। नेतृत्व के अभाव में भी युवाओं, छात्रों, किसानों और आम जनता ने आंदोलन को आगे बढ़ाया।
यही भारत छोड़ो आंदोलन की सबसे बड़ी विशेषताओं में से एक थी—जनता ने खुद आंदोलन की जिम्मेदारी संभाल ली।
बिहार में आंदोलन ने लिया व्यापक जनआंदोलन का रूप
1942 का आंदोलन बिहार में केवल राजनीतिक विरोध तक सीमित नहीं रहा। यह छात्रों, किसानों, युवाओं, महिलाओं और आम नागरिकों की भागीदारी वाला व्यापक जनसंघर्ष बन गया।
पटना सचिवालय के सात छात्रों का बलिदान और जयप्रकाश नारायण की भूमिगत गतिविधियां इस आंदोलन के दो ऐसे अध्याय हैं, जिन्होंने बिहार के स्वतंत्रता संग्राम को अलग पहचान दी।
अंग्रेजी सरकार ने दमन, गिरफ्तारियों और गोलीबारी के जरिए आंदोलन को दबाने की कोशिश की, लेकिन जनता के भीतर आजादी की भावना लगातार मजबूत होती गई।
84 साल बाद भी याद किया जाता है बिहार का संघर्ष
भारत छोड़ो आंदोलन को शुरू हुए 84 साल हो चुके हैं, लेकिन 1942 के उन बलिदानों की स्मृति आज भी बिहार के इतिहास में जीवित है।
पटना सचिवालय पर तिरंगा फहराने के लिए अपने प्राण न्योछावर करने वाले सात छात्रों से लेकर हजारीबाग जेल से निकलकर भूमिगत संघर्ष को गति देने वाले जयप्रकाश नारायण तक—बिहार ने भारत की आजादी की लड़ाई में साहस, संघर्ष और बलिदान की मिसाल पेश की।
भारत छोड़ो आंदोलन ने यह साबित किया कि जब जनता खुद किसी आंदोलन की कमान संभाल लेती है, तो दमन और गिरफ्तारी भी उसके संकल्प को लंबे समय तक नहीं रोक सकते।
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