अयोध्या में युग तुलसी पद्मभूषण पंडित रामकिंकर उपाध्याय का 101वां प्राकट्य उत्सव शुरू श्री रामायणम आश्रम में दो दिवसीय भव्य आयोजन

Nov 1, 2025 - 12:40
Nov 16, 2025 - 16:32
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अयोध्या, अचल वार्ता। अवध की पावन धरती पर स्थित श्री रामायणम आश्रम, अयोध्या में शनिवार से युग तुलसी, पद्मभूषण पंडित रामकिंकर उपाध्याय जी के 101वें प्राकट्य उत्सव का शुभारंभ हुआ।

यह भव्य दो दिवसीय आयोजन शनिवार 1 नवंबर और रविवार 2 नवंबर को आश्रम परिसर में अत्यंत श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया जा रहा है।यह उत्सव केवल एक धार्मिक कार्यक्रम नहीं बल्कि अध्यात्म, सेवा, शिक्षा और संस्कृति का जीवंत संगम बन गया है।इस अवसर पर देश के कोने-कोने से आए भक्त, संत, विद्वान, समाजसेवी, शिक्षाविद् और रामकथा प्रेमी आश्रम परिसर में एकत्र हुए हैं।अवध में रामकिंकर उपाध्याय की अमर परंपरापंडित रामकिंकर उपाध्याय का नाम आधुनिक भारत के उन मनीषियों में शुमार है जिन्होंने रामचरितमानस, धर्म और समाज के समन्वय का कार्य किया।

  उन्होंने अपने जीवनकाल में अवध धाम में श्री रामायणम आश्रम की स्थापना की थी, जहाँ से उन्होंने अध्यात्म, संस्कृति और समाजसेवा के अनेक आयाम स्थापित किए।उन्होंने अपने जीवन की अंतिम वेला में यही संकल्प लिया था कि वे इसी पावन स्थली पर समाधिस्थ होंगे।आज भी उनका यह आश्रम श्रद्धा, सेवा और सदाचार की प्रेरणा का केन्द्र बना हुआ है।माता मंदाकिनी रामकिंकर के संरक्षण में जीवंत है परंपरापूज्य रामकिंकर उपाध्याय की आध्यात्मिक उत्तराधिकारी एवं अंतरराष्ट्रीय रामकथा प्रवक्ता दीदी मंदाकिनी रामकिंकर के संरक्षण में वर्तमान में श्री रामायणम आश्रम की संपूर्ण व्यवस्था संचालित है।उनके मार्गदर्शन में आश्रम आज न केवल आध्यात्मिक साधना का केंद्र है, बल्कि सामाजिक और शैक्षणिक सेवा का भी प्रेरणास्रोत बन चुका है।

आश्रम में स्थित पंचमुखी सिद्ध हनुमान मंदिर, रामकिंकरेश्वर महादेव मंदिर और महाराजश्री की समाधि स्थल पर प्रतिदिन त्रिकाल पूजन, अभिषेक, यज्ञ-हवन और आरती होती है।सैकड़ों श्रद्धालु प्रतिदिन इन स्थलों पर दर्शन और पूजा-अर्चना के लिए आते हैं।श्री रामायणम आश्रम में समाज कल्याण के अनेक प्रकल्प निरंतर चलाए जा रहे हैं। वनवासी बालक-बालिकाओं को श्रीरामचरितमानस का पाठ एवं गायन प्रशिक्षण,असहाय और वृद्ध माताओं को वस्त्र और दवा सहायता,दरिद्र नारायण सेवा,गरीब और जरूरतमंद बच्चों को शिक्षा व छात्रवृत्ति सहायता जैसी योजनाएँ लगातार संचालित हैं।इसके अलावा, आश्रम द्वारा पूज्य महाराजश्री की 100 से अधिक कृतियों और पुस्तकों का प्रकाशन भी किया जा रहा है, जिससे उनके विचार और संदेश जन-जन तक पहुँच रहे हैं।पहले दिन का कार्यक्रम अभिषेक, यज्ञ, वेबसाइट लोकार्पण और सांस्कृतिक संध्याशनिवार सुबह कार्यक्रम का शुभारंभ महाराजश्री की समाधि स्थल पर अभिषेक, पूजन, अर्चना और महाआरती से हुआ।

 आश्रम परिसर में भक्तों की भीड़ उमड़ी रही, और “जय श्रीराम” के जयकारों से पूरा वातावरण भक्तिमय बना रहा।सुबह 11 बजे से दोपहर 1 बजे तक विशिष्ट यज्ञ-हवन और अनुष्ठान का आयोजन हुआ।इसके बाद सायं 3 से 6 बजे तक एनसीबीटी औरंगाबाद के प्रोफेसरों और विद्यार्थियों का सम्मान समारोह आयोजित किया गया।इन्हीं विद्यार्थियों द्वारा पूज्य महाराजश्री और श्री रामायणम आश्रम पर आधारित एक नव निर्मित वेबसाइट तैयार की गई है, जिसका लोकार्पण इसी अवसर पर हुआ।आश्रम पहुंची औरंगाबाद की इस टीम ने भक्ति, संस्कृति और राष्ट्र भावना से ओत-प्रोत सांस्कृतिक प्रस्तुतियों से सभी का मन मोह लिया।

 दूसरे दिन का आकर्षण रामकिंकर सम्मान समारोहरविवार, 2 नवंबर को प्रातः 8 बजे गुरु धाम में आरती और प्रार्थना के साथ दिन की शुरुआत होगी।प्रातः 10 बजे से रामकिंकर सम्मान समारोह का भव्य आयोजन होगा।इस वर्ष का प्रतिष्ठित श्री रामकिंकर सम्मानअयोध्या राजपरिवार के सदस्य एवं प्रसिद्ध साहित्यकार-फिल्मकार यतींद्र मिश्र,उत्तर प्रदेश सरकार के इलेक्ट्रॉनिक्स एवं टेक्नोलॉजी विभाग के कैबिनेट मंत्री सुनील शर्मा,के साथ तीन अन्य विशिष्ट हस्तियों को प्रदान किया जाएगा।

  इसके अलावा एनसीबीटी औरंगाबाद के डायरेक्टर हर्षवर्धन को भी इस अवसर पर विशिष्ट सम्मान से अलंकृत किया जाएगा।कार्यक्रम के प्रारंभ में महाराजश्री और आश्रम पर आधारित लघु वृत्तचित्र का प्रदर्शन किया जाएगा, जिसके पश्चात नई वेबसाइट का सार्वजनिक लोकार्पण होगा।अध्यात्म, संस्कृति और सेवा का अद्भुत संगमदो दिवसीय यह आयोजन केवल स्मरण नहीं बल्कि पूज्य रामकिंकर उपाध्याय की प्रेरणा को जीवित रखने का प्रयास है।यह कार्यक्रम आज के समाज को यह संदेश देता है कि धर्म और अध्यात्म केवल पूजा तक सीमित नहीं हैं, बल्कि उनका वास्तविक स्वरूप समाजसेवा, शिक्षा, संस्कार और रचनात्मकता में निहित है।देशभर से आए श्रद्धालु, शिष्य और विद्वान इस आयोजन में भाग लेकर न केवल महाराजश्री को नमन कर रहे हैं, बल्कि उनके आदर्शों को जीवन में उतारने का संकल्प भी ले रहे हैं।अयोध्या के इस पावन अवसर ने एक बार फिर सिद्ध कर दिया है कि जब भक्ति, सेवा और शिक्षा एक साथ मिलते हैं, तो वही समाज में सच्चे परिवर्तन का आधार बनता है।युग तुलसी रामकिंकर उपाध्याय के 101वें प्राकट्य उत्सव के ये दो दिन अवध में रामभक्ति, विचार और संस्कृति के अद्भुत संगम के रूप में इतिहास में अंकित हो रहे हैं।

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